Thursday, February 10, 2011

साथ चलें



बंद करो तकरार मुझे तुम माफ़ करो
जीत गए अब तो अश्को को साफ करो.
तुम से होकर दूर मुझे हिचकी सी आती
दिल की धड़कन अक्सर थम थम जाती.

निकल गए सब कांटे लेकिन घाव हरा
आशंकाओ से मेरा मन रहता डरा-डरा.
किन्तु मन मे फिर भी जीवित आशा है
शायद यही प्रीत की चिर परिभाषा है.

जव वियोग की यह दुपहर ढल जायेगी
तय है मधुर-मिलन - रजनी भी आयेगी.
आओ एक बार फिर हम तुम साथ चलें
गले मिलें हम लेकर हाथो में हाथ चलें.

12 comments:

Shivani said...

ek baar phir bahut achha likha hai aapne ...ashawadi kavita hai ..
aashankaaon se mera mann rahta dara dara
kintu mann mein phir bhi jeevit asha hai
nice lines..likhte rahiye ...aapko padhna achha lagta hai ......

पुनीत ओमर said...

hari ji, achha hai apka lekhan. aur kya kya likh rahe hain aajkal. ham sabhi ko padhne ka avsar dijiye. pratibha ko yu chhipayenge to kaise chalega bhala?

dhirendra chandel said...

SACHMUCH ACHCHHI RACHNA.........

DIL SE GUZARNE WALI !!!!

Kulwant Happy said...

अद्भुत रचना। दिल को छूती रचना। मग पर फोटो भी शानदार है।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन रचना.

वाणी गीत said...

मन मे फिर भी जीवित आशा है
शायद यही प्रीत की चिर परिभाषा है....
प्रीत की प्रीति पर रीझती सी कविता अच्छी लगी ...!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

इस सुन्दर रचना को पढ़कर मन प्रमुदित हो गया!

Shekhar Kumawat said...

achi rachna

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना जी, चित्र भी मग वाला बहुत सुंदर. धन्यवाद

रंजन said...

bahut sundar!!

दर्शन कौर धनोय said...

जव वियोग की यह दुपहर ढल जायेगी
तय है मधुर-मिलन - रजनी भी आयेगी.
आओ एक बार फिर हम तुम साथ चलें
गले मिलें हम लेकर हाथो में हाथ चलें.

bahut sahi or jivit bhav.....

दर्शन कौर धनोय said...

जव वियोग की यह दुपहर ढल जायेगी
तय है मधुर-मिलन - रजनी भी आयेगी.
आओ एक बार फिर हम तुम साथ चलें
गले मिलें हम लेकर हाथो में हाथ चलें.

bahut sahi or jivit bhav.....