Thursday, February 10, 2011

मै और मेरी जिन्दगी


मै और मेरी जिन्दगी भी
अकसर खेल खेलते है 


कभी मै जिन्दगी के पीचे 
कभी जिन्दगी मेरे पीछे 
कभी लगता है 
बस अब मिल गयी 
लेकिन फिर होती है 
आन्खो से ओझल जिन्दगी


कभी रूठ जाती है जिन्दगी 
कभी मान करती है जिन्दगी
कभी आन्खो मे 
कभी दिल मे 
और कभी आत्मा मे 
प्रवेश करती है जिन्दगी
कभी मुझसे मिलने
मेरे घर आती है जिन्दगी


और जब मिलती है जिन्दगी
तभी खतम हो जाती जिन्दगी

10 comments:

Dheerendra Singh said...

Zindagi... Kavyatmak sundar paribhasha... Kisi bade shayar ka sher hai....
Zindagi to kabhi nahi aayi,
maut aayi jara jara karke...

राजीव तनेजा said...

जिन्दगी के फलसफे को बड़ी खूबसूरती से समझाया है आपने ...

वाणी गीत said...

खोते खोते मिल जाती है जिंदगी ...
और जब मिलती है तो खोने को ...
इसी पल दो पल में पूरी उम्र निकल जाती है ...
तलाशते जिंदगी

अच्छी लगी कविता

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अब तो जीना है तो जिन्दगी को नमन करना होगा।

Vijay Kumar Sappatti said...

wow sharma ji., kya khoob likha hai .bahut hi royal to uchdiyahai zinda gikiphi losphy ko... waha maan gayej i... badhay isweekar kijiye ... aapneahrwobaatiskavit amedaal dihai ,,,jis sekih amg ujartehia ...

Udan Tashtari said...

वाह री जिन्दगी!!!

बढ़िया.

महफूज़ अली said...

जिन्दगी के फलसफे को बड़ी खूबसूरती से समझाया है आपने ...

शिवम् मिश्रा said...

बहुत बढ़िया पोस्ट शर्मा सर !!

दर्शन कौर धनोय said...

ZINDGI KA AEK AJIB FALSAFA HAI ..

ashvaghosh said...

bahut khoob zindagi ko samjhane ki koshish