Thursday, March 10, 2011

अहसास - श्रीमती रजनी मोरवाल



अहसासों के साये-साये साँझ ढली-सी आई
ख्वाबों ने कलियों को खोले पंखुरियां फैलाई |

शानों पर सर रखकर 
नींदें अलसाई सी जागी,
सिहरन की गलियों में
ख़ुशबू पोर-पोर में भागी,

रेशम की साड़ी कुछ लरजी सिकुडन-सी बल खाई |

लब्ज ठिठक कर थमे रह गए
अधरों के भीतर में,
किन्तु संवेदन मुस्काए
अंगों के अंतर में,

जिस्मों पर लबरेज़ घटाएँ व्याकुल हो मंडराई |

उन्मादित सांसो ने कितने
राज सुनहरे खोले,
लहकी-लहकी काया ने
संवाद अनकहे बोले,

मद्धम-मद्धम शहनाई की स्वर लहरी लहराई | 

1 comment:

asha said...

बहुत सुन्दर रचना है रजनी जी......और उससे भी सुन्दर विषय "एहसास"............. मन के तारों को झंकृत करती....