Saturday, August 22, 2015

कुछ बातें अपने मन की



दो ईंट
एक पत्थर
कुछ सपने हैं अपने
नेह की बजरी विश्वास का सीमेंट
लो अपना तो बन गया घर

गालों में आंसू
लगते है मोती से
नैनों मे आस हो
सजना हो पास तो
नित नया मधुमास हो 

किसने कहा सब कुछ नश्वर है
मेरे पास हैं उनकी यादें
उनके जाने के बाद भी

प्यार तो तब मानू
जब में यहाँ चुम्बन लूं
तुम वहां शर्मा जाओ


वो जुबान से हम आँख से लड़ते रहे
इसी चक्कर में आँख लड़ गयी

9 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

आंख लड़ी कम गड़ी अधिक ज्‍यादा होगी।
एक पत्‍थर दो ईंट से

सिर भी फूटते हैं

फिर देखना देख कर उन्‍हें

कितने फूटते (भागते) हैं ?

Jandunia said...

रचना अच्छी है.

Kulwant Happy said...

प्यार तो तब मानू
जब में यहाँ चुम्बन लूं
तुम वहां शर्मा जाओ

इतनी गहरी शर्त न रखें। वैसे प्यार में शर्त होती ही कहाँ है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

वाह, वाह...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

हम वरिष्ठ लोगों को भी प्रेरणा मिल गई!
बहुत सुन्दर!

Anonymous said...

hari ji bahaut khoob
गालों में आंसू
लगते है मोती से
नैनों मे आस हो
सजना हो पास तो
नित नया मधुमास हो

sach kaha aapne gaalo pr jab aanshu hote hai motihi lagte hai......

anu said...

दो ईंट
एक पत्थर
कुछ सपने हैं अपने
नेह की बजरी विश्वास का सीमेंट
लो अपना तो बन गया घर


गालों में आंसू
लगते है मोती से
नैनों मे आस हो
सजना हो पास तो
नित नया मधुमास हो


ये पंक्तियाँ ...कविता की जान है ....बहुत खूब

मीनाक्षी said...

मुक्तक कहूँ या क्षणिका.. सभी लाजवाब ..

दर्शन कौर 'दर्शी' said...

प्यार तो तब मानू
जब में यहाँ चुम्बन लूं
तुम वहां शर्मा जाओ........bahut sunder !