Friday, September 24, 2010

नरगिस के फूल


फिर रहा था बादल बन गिरिशिखर के उपर,
देखा था एक झुंड सा अचानक से नीचे,
बिछा हुआ था स्वर्णिम नरगिस पुष्पों का
नरगिस के फूल झील के किनारे, पेडों के बीच
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जैसे सदा जगमग चमकते आकाशगंगा के तारे
अनंत विस्तार तक प्रकाश बिखेर रहे थे
तब सजे थे करीने से थोड़े थोड़े अंतर पर
नयनो में बसा लिया उनका प्रमुदित नृत्य
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चल रहा था पास उनके लहरों का नर्तन
हर्ष से सराबोर हो मै ले रहा आनंद जिसका
रोशनी का जन्मदिन प्रकाश ही प्रकाश जैसे
आनंद की दौलत समेटता रहा निहार ये सब
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अब भी कभी खाली समय मन हो उदास तब
दृश्य वही नयनो में खिचे चले आते हैं
एकांत का साथी वो दृश्य कितना प्यारा है
नयनो़ मे़ नर्गिस की छवि अटक जाती है।
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( विलियम वर्डसवर्थ की कविता ’ डेफोडिल्स' के भाव लिए गए हैं )

7 comments:

Pankaj Mishra said...

बहुत सुन्दर आपने वर्णन किया है

Kusum Thakur said...

अच्छे भाव और अच्छी कविता । आभार !

kaafir... said...

bhaiya aapne itne mahaan saahityakaar ko padhne ka mauka itne saral tareeke se diya wah wah wah aabhaar aapka.

Vijay Kumar Sappatti said...

hari ji

namaskar

deri se aane ke liye bahut maafi chahunga

aapki ye kavita mere man ko choo gayi ,, iske do kaaran hai , pahka wordworth mere pasandida kavi hai aur dafodils mujhe bahut pasand hai ..

dusara kaaran aapka pratutikaran , aapne itni mohak aur acchi kavita likhihai ki main shaant ho kar padhta raha aur saare drushya jaise sajeev hokar mere aankho ke saamne jaise jeevant ho uthe hai ..

aapki kalam ko mera salaam ...

meri badhai sweekar karen..

regards

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत सुन्दर...

वाणी गीत said...

विलियम वर्डस्वर्थ की यह कविता पढ़ी तो थी ...भावार्थ में थोड़ी उलझी थी ...
नर्गिस की छवि अटकी आँखों में ....साकार हो रही है आपके दृश्य गीत में ...!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अब भी कभी खाली समय मन हो उदास तब
दृश्य वही नयनो में खिचे चले आते हैं
एकांत का साथी वो दृश्य कितना प्यारा है
नयनो़ मे़ नर्गिस की छवि अटक जाती है।

बहुत सुन्दर भाव लिए हुए,
बढ़िया प्रस्तुति!