Saturday, May 30, 2009

garmee ke din


पत्तो से पेड़ों के
आती छनकर किरणें
आग सी बरसती है.
मानव की बात दूर
पौधे कुम्हलाते हैं.

चलती है गरम हवा
लू लगने के डर से
घर में छिप जाते हैं.
धूप से पराजित हो
तड़प तड़प जाते हैं.

रुकने की आस लिए
बढते जाते पथिक
छाँव कहीं आगे है
जलते हैं पैर भले
चलते ही जाते हैं.

नीम तले खटिया पर
सोने सी दोपहरी
लेटकर बिताते हैं
चांदी सी रातों में
थककर सो जाते हैं

7 comments:

Udan Tashtari said...

भावपूर्ण प्रवाहमय!!

sanjiv gautam said...

नीम तले खटिया पर
सोने सी दोपहरी
लेटकर बिताते हैं
चांदी सी रातों में
थककर सो जाते हैं

बहुत अच्छी है....

vandana said...

very nic poetry

विनोद कुमार पांडेय said...

क्या बात है,बहुत खूब
गर्मी का विवरण इतने
भावपूर्ण अंदाज मे,
अत्यंत सुंदर रचना,धन्यवाद

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

भावपूर्ण सुंदर रचना,धन्यवाद...

अविनाश वाचस्पति said...

दिन देते गर्मी
रातें छीनती नींद
छनती हैं बातें
बीत जाती हैं
चंद मुलाकातों में
मन भर की बातें
बनती हैं सौगातें।

shivani said...

bahut khoob...garmi ke mausam mein aapki kavita padh kar sahi ahsaas ho raha hai...bahut achhi abhivyakti....