Tuesday, March 23, 2010

नक्सलवादी आंदोलन के संस्थापक कानू सान्याल नही रहे



आज के समाचर पत्रो की छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण  खबर है कि नक्सल आन्दोलन के जनक और सच कहे तो स्वतन्त्र भारत के सबसे सन्घर्षशील व्यक्तित्व कानू सान्याल नही रहे.उनका शव हाथीघीसा स्थित उनके घर में रस्सी से लटका हुआ पाया गया. पुलिस मान कर चल रही है कि पिछले कुछ समय से विभिन्न बीमारियों से परेशान कानू सान्याल ने आत्महत्या की है  यह सोचकर तो दिमाग का दिवाला निकल गया कि इस महा नायक ने आत्म हत्या की. मुझे यकीन नही होता.

अन्य साम्यवादी नेताओ की तरह कानू सान्याल बहुत पढे लिखे नही थे.  १९२९ मे जन्मे कानू ने मैट्रिक १९४६ मे किया और जब इन्टर्मीडियेट कर रहे थे तो पढाई छोड दी.  उसके बाद उन्हें दार्जीलिंग के ही कलिंगपोंग कोर्ट में राजस्व क्लर्क की नौकरी मिली. लेकिन कुछ ही दिनों बाद बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 

जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात चारु मजुमदार से हुई. जब कानू सान्याल जेल से बाहर आए तो उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली. 1964 में पार्टी टूटने के बाद उन्होंने माकपा के साथ रहना पसंद किया. 1967 में कानू सान्याल ने दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की. कानू सान्याल और चारु मजुमदार ने मिल कर बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन चलाया था, जिसके बाद वह आंदोलन पूरे देश में नक्सल आंदोलन के नाम से जाना गया.

24 मई 1967 को जिस आंदोलन की आग उन्होंने जलाई थी, वो आग आज भी उनके भीतर धधकती रहती थी. यही कारण है कि इस उम्र में भी वे गांव-गांव जाते थे, बैठक करते थे, सभाएं लेते थे. दार्जीलिंग के नक्सलबाड़ी से लगे हुए एक छोटे से गांव हाथीघिसा में अपने एक कमरे वाले मिट्टी के घर में रहने वाले कानू सान्याल की नज़र बस्तर से लेकर काठमांडू तक बनी रहती थी. हर खबर से बाखबर !

उनकी राय है कि भारत में जो सशस्त्र आंदोलन चल रहा है, उसमें जनता को गोलबंद करने की जरुरत है. अव्वल तो वे इसे सशस्त्र आंदोलन ही नहीं मानते. छत्तीसगढ़, झारखंड या आंध्र प्रदेश में सशस्त्र आंदोलन के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वे इसे “आतंकवाद” की संज्ञा देते हैं. वे नक्सलबाड़ी आंदोलन को भी माओवाद से जोड़े जाने के खिलाफ हैं. वे साफ कहते हैं- There is no existence of Maoism.

वो मानते थे कि जनता ही केवल देश की  शक्ति है. वो जनता अगर आपको साथ ना दे तो आप आगे नहीं बढ़ सकते हैं. और विशेषकर के मजदूर और उनका सबसे दृढ़ सहयोगी जो है किसान, उनकी संख्या भी सबसे ज्यादा है. वो अगर उनका साथ ना दे तो ये संग्राम टिक नहीं पाएगा. 

नक्सल्वादी आन्दोलन शुरू होने के दिनो को याद कर वो बताते थे कि अपने बडे नेताओ से वो जानना चाह्ते थे कि सत्ता मे आने पर वो जनता के लिये, मजदूरो के लिये, किसानो के लिये और गरीबो के लिये क्या क्या करेगे ये बताया जाये. उन्हे जबाब मिलता था - चुनाव तो जीतने दो आगे तब देखा जाएगा. भारत में उस समय 9 प्रांत में कांग्रेस खत्म हो गयी थी, यानि सत्ता से उखाड़कर फेंक दी गयी. लेकिन उन्हे अनुभव हुआ कि ना तो कांग्रेस, ना तो कम्यूनिस्ट पार्टी जो अपने आप को मजदूर किसान का हिमायती करती है. उनका कोई political will, (will) वो इस बात पर जोर देना चाहते थे,  कभी भी नहीं थी, आज भी नहीं है. 

फिर किसानो के बीच जाकर उन्होने कहा  - 
देखिए शांतिपूर्ण रूप से होगा नहीं हम लठ से, तीर धनुष से, बंदूक राइफल से लड़ नहीं सकते. तो naturally आपको तीर धनुष लेके शुरु करना होगा और बंदूक आपको अपने हाथ में लेना होगा. हम लोग ये बात सीखा करते थे कि हमारी बंदूक पुलिसों के हाथ में है, हमारी बंदूक मिलिटरी के हाथ में है. ये हमारे है, हमारे पैसा से है. पुलिस बजट में खर्चा होता है, मिलिटरी बजट में खर्चा होता है, ये हमारे पैसों का है, हम संगठित नहीं है. इसलिए बंदूक उनके हाथ में है. वो बंदूक हमारे हाथ में लेना है. अगर आप जमीन का रक्षा काहे कि अगर यहां कि भूमि व्यवस्था को आप पलटना चाहते हैं तो ये व्यवस्था का बात आ जाता है और जब व्यवस्था का बात आ जाता है तो वो चुपचाप बैठने वाला नहीं है. वो चुपचाप नहीं बैठेगा, वो आपके उपर दबाव बनाएगा.

पार्टी को जब छोड़ा तब के बारे मे कानू बताते है  - 1964 में सीपीएम ने थे. तो सीपीएम में, अंदर में revisionist leadership के विरोध में लड़ने लगे. एक तो दूसरी बार जेल गये. जब भारत-चीन युद्ध हुआ तो सरकार को ये डर था कि ये क्रान्तिकारी दल बन रहे है.   बंगाल में उन समेत ८ आदमी  की गिरफ्तारी हुई थी. प्रमोद दा भी उनके बीच गिरफ्तार हो गए थे और वे इस कारण से पार्टी कोन्ग्रेस मे भाग नही ले पाये थे. उस सम्मेलन के बाद उन लोगो को ये साफ़ हो गया था कि ये पार्टी (सी पी एम ) कुछ करने वाली नहीं है.


उसी समय सितंबर महीने में आनंदबाजार पत्रिका में एक खबर आयी कि चारु मजूमदार ने एक लेख लिखा है जिसमें सशस्त्र सन्घर्ष का आह्वान किया है. तो हम लोगों ने वो लेख पढ़ा जेल में तो हम उससे असहमत थे. फिर हम 66 में जेल से रिहा होकर आए और आने के बाद उनसे बातचीत हुई. हम लोग बोले - देखो हम आपके साथ सहमति रखते हैं कि सशस्त्र सन्घर्ष   करना है. लेकिन इसके लिए जनता तो आपके साथ में होना चाहिए. आप जनता को बताये कि यह जनहितकारी सुधारात्मक आन्दोलन है. प्राथमिक सन्गठन को आप छोड़ दीजिएगा तो आप जनता से कट जाइएगा. तो हम लोग बोला कि हम लोग एक साथ लड़ेंगे सुधारवाद के खिलाफ में. और हम लोग दो जगह चुनाव कर लें. आप अपने दस्ते को प्रयोग में लाएंगे. हम भी अपने जिला में दार्जिलिंग जिला में अमल में लाएंगे. किसी आदमी को षडयंत्रकारी कायदा से मारने से व्यवस्था खत्म नहीं होती. हां लड़ाई के मैदान में बोलिए व्यवस्था को मारने के लिए राइफल हाथ में लो, बंदूक जुगाड़ करो, बंदूक लूटो, ये अगर बोलें तो ये समझ में आता है. लेकिन क्या वास्ते बंदूक लूटेंगे, आपका कार्यक्रम होना चाहिए, मजदूर के लिए, किसान के लिए वो ही तो इस देश की संख्या है. वो ही लोग अगर इस संग्राम में नहीं रहेगा तो कैसे कर के हमारा संग्राम आगे बढ़ेगा.  नक्सलबाड़ी का संर्घष इसी का परिणाम है.








ये जो आंध्र में, छत्तीसगढ़ में, झारखंड में ये जो हथियारबंद आंदोलन चल रहे हैं उनके बारे मे कानू सान्याल कहते हैं कि ये आतन्कवादी हैं. वे मुख्य रूप से पैसे, बन्दूक और आतन्क पर निर्भर करते है. ये लोग आदमी को धमकी देकर पैसा देकर, पैसे वाले को अदा करते हैं कि कुछ कर रहे हैं. जनता को साथ लिये बिन ये लडाई सफ़ल नही होगी. 

अपने जीवन के लगभग 14 साल कानू सान्याल ने जेल में गुजारे. इन दिनों वे भाकपा माले के महासचिव के बतौर सक्रिय थे और नक्सलबाड़ी से लगे हुए हाथीघिसा गांव में रह रहे थे. दो साल पहले लकवाग्रस्त होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था. लेकिन इसके बाद उन्होंने कहीं भी भर्ती होने से इंकार कर दिया था.



डिस्क्लेमर : 

इस लेख के अधिकतर तथ्य http://www.raviwar.com पर आये लेख और रविवार पर ही प्रकाशित बातचीत से लिये गये है.

इस लेख का मकसद नक्सलवाद को बढावा देना नही है बल्कि नक्सल्वाद को समझने और कानू सान्याल के उस नक्सली चिन्तन के आदर्श को समझने का प्रयास किया है जिसके लिये वो जीवन के अन्त तक सन्घर्ष की राह पर चलते रहे और एक जीवन्त मिथक के रूप मे चर्चित् रहते हुए भी जिसने एक झोपडी मे अपना पूरा जीवन गुज़ार दिया.

हम हर तरह की हिन्सा की निन्दा करते है लेकिन कामना करते है कि समाज इतना समतावादी हो और देश मे इतना अमन चैन और खुशहाली हो कि देश मे किसी को भी इस राह पर चलने की इच्छा ही पैदा ना हो.

11 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

कानू की आत्महत्या यह साबित करती है कि बुरे का अंत बुरा ही होता है !

चन्दन कुमार said...

कहा जा रहा है संन्याल ने आत्म हत्या की.....पर देखा जाए तो संन्याल ने आत्म हत्या नहीं की हम सभी ने उनकी हत्या की है...

HARI SHARMA said...

आदरणीय गोदियाल जी अच्छा और बुरा सतही बहसे है. जो भी व्यक्ति अपनी आस्था और विचार पर अडिग रहा और कोई भी भौतिक परेशानी उसे अपने पथ से विचलित नही कर सकी ऐसे उन सभी लोगो के लिये मेरे मन मे बहुत सम्मान है. गान्धी जी और उनके चेले चान्टो की नज़र मे भगत सिह भी राह से भटके हुए थे लेकिन गान्धी दर्शन के प्रति अपनी रुचि के बाबजूद भगत सिह मुझे आज भी नायक नज़र आते है.
जो लोग अपने जीवन काल मे अपने मकसद मे कामयाब नही हो सके उनके लिये दिनकर जी की एक कवित के अन्श दे रहा हू.

है यहा तिमिर आगे भी ऐसा हे तम है
तुम नील कुसुम के लिये कहा तक जाओगे
जो गये वही तो आज तलक ना लौट सके
नादान मर्द तुम अपनी जान गवाओगे

प्रेमिका, अरे उन शोख बुतो का क्या कहना
वो तो यू ही उन्माद जगाया करती है
पहले तो लेती खीच प्राण के तारो को
फिर चुम्बन पर प्रतिबन्स्द्ध लगाया करती है

उनमे से किसने कहा चान्द से कम लुन्गी
पर चान्द धरा पर कौन यहा ला पाया है
किसका जहाज फिर नील नदी से लौट सका
है कौन यहा बिछडोकी याद दिलाता है

अब जबाब सुनिये गोदियाल जी -

हे नीतिकार तुम झूठ नही कहते होगे
बेकार मगर पगलो को ग्यान सिखाना है
मरने का होगा खौफ़ मौत के छाती मे
जो अपनी जिन्दगी ढूढने जाते है

आगे की पन्क्तिय ऐसे वलिदानी की स्तुति मे है अन्त मे कवि ने लिखा है

हो जहा कही भी नील कुसुम की फ़ुलवारी
मै एक फ़ूल तो किसी तरह ले आउन्गा
जूडे मे जब तक गूथ न दो उन फ़ूलो को
किस तरह प्राण के मणि को गले लगाउन्गा.


आपने अपने विचार रखे, आभार.

मिहिरभोज said...

भले से वे किसी भी विचार धारा मैं आस्था रखते थे....पर इतना तो निश्चित है उस व्यक्ति मैं पीङितों के प्रति अदम्य इच्छा थी काम करने की ...और उन्होने उसे पूरे जीवन इस चीज को निभाया....ऐसे व्यक्ति को शत् शत् नमन

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप की इस प्रस्तुति का आभार व्यक्त करना चाहूँगा। अभी तो यह तय नहीं कि कानू सान्याल ने आत्महत्या ही की है।
उन में ईमानदारी थी और वे सदैव जनता के साथ थे। यह तय करने में तो अभी अनेक वर्ष लगेंगे कि वे सही थे या गलत और उन्हों ने गलती की तो क्या की।

riya said...

such a interesting story..!

अविनाश वाचस्पति said...

इंसान तो गलती करेगा ही
अच्‍छे काम भी करेगा इंसान ही
पर हम पहचानेंगे अच्‍छे कामों को
उनके गुजर जाने के बाद ही
यह तो तय है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

नक्सलवादी आंदोलन के संस्थापक कानू सान्याल जी को भावभीनी श्रद्धाञ्जलि!

Kulwant Happy said...

मुझे मेरा गुनाह ले बैठा

anitakumar said...

द्विवेदी जी से पूर्णतया सहमत्॥आप ने टिप्प्णी के जवाब में जो कविता लिखी है वो बहुत अच्छी लगी, किसकी लिखी हुई है?

H P SHARMA said...

@ anita ji, tippanee waale kavita dinkar jee kee hai. naam bhee likha hai sahee jagah par