Wednesday, February 24, 2010

होली के बहाने यादें बचपन की



आज होली के इस मौके पर जब मैं ब्लॉग लेखक के रूप में धीमी लेकिन सक्रिय शुरुआत कर चुका हूँ, मुझे अपने बचपन की होली याद आती है। याद आती है अपने कस्बे की और वहाँ की होली, जिसकी चर्चा दूर दूर तक थी और आस पास के गाँव के लोग चलकर होली के दिन भी धमाल देखने आते थे।

मैं बात कर रहा हूँ हिंडौन की जहाँ होली १-२ दिन नही बल्कि १ महीने चलने बला त्यौहार हुआ करता था। महिलाए जहाँ १ महीने पहले से ही होली के गीत गाया करती थीं तो पुरूष हुरियारे बने मंदिरों मैं ढोलक और ढप की थाप पर होली गीतों पर गाते और नाचते थे।

होलिका दहन के लिए लड़कों की टोलियाँ घर घर से लकडियाँ और उपले मांग के लाती और उसे अपने गुप्त स्थान पर सुरक्षित रखती साम दाम दंड भेद इस संग्रह को और बढ़ाने के लिए मीटिंग होती योजनाये बनाई जाती। पडौस के होली के सामान की रिपोर्ट ली जाती और अपने लक्ष्य संसोधित किए जाते। होलिका दहन बाले दिन ऐसे कंजूस लोग जो मांगने पर लकडी उपले नही देते उनके घर मौका देखकर सेंध लगाई जाती और जो मिले पलंग, कुर्सी, किवाड़ या कोई लकडी का सामान जो मिला वो होली के हवाले फिर पता चलने पर कंजूस का शोर मचाना और गालिया देना होलिका महोत्सव का चिर परिचित रंग होता था।

मेरे पिताजी की मित्र मंडळी पोंगा मंडल कहलाती थी और इसकी सदस्यता को लोग लालायित रहते थे। इसके सभी सदस्य कस्बे में पढ़े लिखे विचारक माने जाते थे यह पोंगा शब्द मुझे लगता है पोंगा पंडित फ़िल्म से लिया गया था लेकिन ये तय है वे सभी सच्चे पोंगा थे।

पोंगा मंडल प्रति वर्ष होली के मौके पर भभक पत्रिका का प्रकाशन करता था और इसमे मस्त गीत, मस्त विज्ञापन और मस्त टाइटल दिए जाते थे। टाइटल अंतररास्ट्रीय हस्तियों से शुरू होकर स्थानीय लोगो तक होते थे। पोंगा मंडल के सक्रिय सस्दास्यो के नाम अंत में होते थे। भभक में जिनके नाम छपते थे वो ख़ुद को औरो से बड़ा और प्रसिद्द मानते थे और जिनके नही छपते वो अगले साल होली से पहले पोंगाओं से मिलना जुलना बढ़ा देते। कुछ लोग अपने टाइटल को पसंद नहीं करते पर इस डर से की कहने पर अगले साल नाम गायब नही हो जाए चुप रहते। कुछ लोग शिकायत करते, आपने क्या सोचकर हमारे लिए ऐसा टाइटल दिया तो उन्हें तत्काल कोई सकारात्मक तर्क देकर खुश किया जाता।
बाकी तो होली के दिन सवेरे मोहल्लों के मंदिरों के अहातों में लोग इकट्ठे होते और होली के श्लील, अश्लील गाने गाये जाते, खुलेआम नाम ले लेकर गालियाँ दी जातीं। औरतें घर से वहार झांक भी नही सकती थीं। और लड़कों की टोलियाँ अपनी यार दोस्तों के साथ गली गली चक्कर काट रही होती थी लोग अपने मिलने बालो के यहाँ समूग बनाकर खूब घर घर जाकर होली खेलते और भानग ठंडाई और गुजिया - नमकीन खाते रहते। कुछ लोग शराब भी पीते पर उस समय ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी। १ बजे तक ये क्रम चलता। सवेरे लोग घर से निकलते तो कपड़े पहनकर ही वापसी पर जो पहनकर आते उन्हें भी कहते तो कपडा ही हैं लेकिन उनमे वो आधुनिक मल्लिका शेरावत या उस समय की हेलन के रूप लगते थे।
फिर लोग नहा धोकर अच्छे कपड़े पहनकर दोपहर को घर से निकलते गुलाल की होली और धमाल देखने के लिए। शहर के बीचों बीच सभी मोहल्लों की टोलियों के प्रतिनिधि इस धमाल में शामिल होते थे और इस धमाल की चर्चा दूर दूर होती थी। इसमे भी कुछ हद तक गालीबाजी होती थी लेकिन सांस्कृतिक होली के कुछ गीत भी होते थे जिन्हें सुनना रुचिकर लगता था। इस तरह शाम को करीब ७ बजे तक होली की धूम रहती थी।

आप सभी को होली के इस शुभ अबसर पर रंगारंग शुभकामनाये।
पोंगा हरि शर्मा




14 comments:

अनूप शुक्ल said...

होली मुबारक!

संगीता पुरी said...

होली की ढेरो शुभकामनाएं ...

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

होली कैसी हो..ली , जैसी भी हो..ली - हैप्पी होली !!!

होली की शुभकामनाओं सहित!!!

प्राइमरी का मास्टर
फतेहपुर

Udan Tashtari said...

होली की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

suryakant gupta said...

[b][blue]aapki yaaden bilku sahi hain
yadi ashleelta ko hata diya jaay
to pahle kafee apnatwa hua karta tha
aaj mahaj ek aupachrikta ban kar rah gayee hai.

HOLI KI AAPKO BHI HAMARE PARIWAR KI OR SE BAHUT BAHUT SHUBHKAMNAYEN

નીતા કોટેચા said...

होली की बहुत बहुत बधाई

और ब्लॉग के लिए भी बहोत बधाई

poemsnpuja said...

badi khoobsoorat yaadein hain. ham sab apne bachpan ki holi ko bade pyaar se yaad karte hain. accha laga aapke yahan ki holi ke bare me jaankar.

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ, आप हिन्दौन के हैं यह जानकर प्रसन्नता हुई... आपने होली की यादें ताजा कर दीं...बहुत अच्छा लगा...संपर्क बनाए रखें...

Sunny said...

dat ws a beautiful vivid description...kaash main bhi hindaun mein holi mana pata...

rashmi ravija said...

बहुत ही सुन्दर तरीके से आपने अपने कस्बे की होली का वर्णन किया है...और टाइटल से तो बहुत कुछ याद आ गया...तैयार रहिये शाम को शायद आपको भी किसी ब्लॉग पर मिल जाए..:)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

होली की बधाई स्वीकार करें!

shashisinghal said...

रंगों का त्यौहार होली आपके जीवन को रंगों से सराबोर करे ....। ढेरों शुभ्कामनाओं के साथ होली मुबारक हो ........

Dimpal Maheshwari said...

बसंत के मौसम में उगी अंकुरों की टोली
आपके चेहरे पर हरियाली हिल डोली
इसलिए कहते हैं आपको हैप्पी होली

दर्शन कौर धनोय said...

अब तो आपको सोमेश्वर की होली लिखना चाहिए फोटू समेत