जनम होता हमारा ओपनिंग बैलेंस यहाँ
आख़िरी की सांस होती क्लोजिंग बैलेंस जी
जिद है हमारी भैया करंट लाइबिलिटी यहाँ
सीखने की इच्छा है अपने असिट जी
दिल है हमारा भैया करंट असिट यहाँ
सुद्ध साफ आत्मा है फिक्सड असिट जी
बुद्धि दिमाग होता फिक्सड डिपॉजिट यहाँ
मेहनत से काम करना करंट अकाउंट जी
उपलब्धियाँ हमारी कैपिटल होती है यहाँ
चरित्र हमारा भैया स्टॉक इन ट्रेड जी
मित्रगन हमारे हैं जनरल रिज़र्व यहाँ
सद्व्यवहार हमारी गूडविल होता है जी
धैर्य है हमारे द्वारा अर्जित व्याज यहाँ
सबका मिला प्यार हमें मिले दिविदेंत जी
बाल बच्चे हमारे बोनस इशू है यहाँ
और शिच्छा है यहाँ ब्रांड और पेटेंट जी
ज्ञान हमारे द्वारा किया इनवेस्टमेंट यहाँ
अनुभव होता है हमारा प्रीमियम जी
आदमी को चाहिए इसे अक्यूरेट रखे
और चाहत ऐसी इसे साफ सुथरा रखे जी
स्क्रैप पोस्ट करें रद्द करें
Thursday, April 8, 2010
Sunday, March 28, 2010
आज है जन्मदिन - प्रसिद्ध गीतकार स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्रा का
जन्म २९.०३.१९१३ - निधन २०.०२.१९८५
आज अपने विचारो को निर्भीकता के साथ अपने गीतो मे पिरोने बाले गीतकार भवानी प्रसाद मिश्रा जी का जन्मदिन है. उनकी गान्धीवादी विचारो मे अटूत आस्था थी. १९५३ से १९८३ के बीच उनकी कुल २२ पुस्तके प्रकाशित हुई जिनमे बुनी हुई रस्सी प्रमुख है और इसके लिये उन्हे १९७२ का साहित्य अकादमी पुरुस्कार मिला. अन्य बहुत से सम्मानो के साथ उन्हे भारत सरकार ने पदमश्री से भी विभूषित किया. उनकी प्रमुख रचनाये है गीत फ़रोश, चकित है दुख, गान्धी पन्चशती, अन्धेरी कविताए, बुनी हुई रस्सी, व्यक्तिगत, खुशबू के शिलालेख, परिवर्तन जिए, त्रिकाल सन्धया, अनाम तुम आते हो, इदन मम, शरीर कविता फ़सले और फ़ूल, मान-सरोवर दिन, सम्प्रति, नीली रेखा तक. उनकी याद मे प्रस्तुत है उन्ही का लिखा एक लोकप्रिय गीत.
गीत फ़रोश
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ ।
मैं तरह-तरह के
गीत बेचता हूँ ;
मैं क़िसिम-क़िसिम के गीत
बेचता हूँ ।
जी, माल देखिए दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं है, काम बताऊंगा;
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने;
यह गीत, सख़्त सरदर्द भुलायेगा;
यह गीत पिया को पास बुलायेगा ।
जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझ को
पर पीछे-पीछे अक़्ल जगी मुझ को ;
जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान ।
जी, आप न हों सुन कर ज़्यादा हैरान ।
मैं सोच-समझकर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ;
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ ।
यह गीत सुबह का है, गा कर देखें,
यह गीत ग़ज़ब का है, ढा कर देखे;
यह गीत ज़रा सूने में लिखा था,
यह गीत वहाँ पूने में लिखा था ।
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है
यह गीत बढ़ाये से बढ़ जाता है
यह गीत भूख और प्यास भगाता है
जी, यह मसान में भूख जगाता है;
यह गीत भुवाली की है हवा हुज़ूर
यह गीत तपेदिक की है दवा हुज़ूर ।
मैं सीधे-साधे और अटपटे
गीत बेचता हूँ;
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ ।
जी, और गीत भी हैं, दिखलाता हूँ
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ ;
जी, छंद और बे-छंद पसंद करें –
जी, अमर गीत और वे जो तुरत मरें ।
ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं पास रखे हूँ क़लम और दावात
इनमें से भाये नहीं, नये लिख दूँ ?
इन दिनों की दुहरा है कवि-धंधा,
हैं दोनों चीज़े व्यस्त, कलम, कंधा ।
कुछ घंटे लिखने के, कुछ फेरी के
जी, दाम नहीं लूँगा इस देरी के ।
मैं नये पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ ।
जी हाँ, हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूँ ।
जी गीत जनम का लिखूँ, मरन का लिखूँ;
जी, गीत जीत का लिखूँ, शरन का लिखूँ ;
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का ।
कुछ और डिजायन भी हैं, ये इल्मी –
यह लीजे चलती चीज़ नयी, फ़िल्मी ।
यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत,
यह दुकान से घर जाने का गीत,
जी नहीं दिल्लगी की इस में क्या बात
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात ।
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
जी रूठ-रुठ कर मन जाते है गीत ।
जी बहुत ढेर लग गया हटाता हूँ
गाहक की मर्ज़ी – अच्छा, जाता हूँ ।
मैं बिलकुल अंतिम और दिखाता हूँ –
या भीतर जा कर पूछ आइये, आप ।
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप
क्या करूँ मगर लाचार हार कर
गीत बेचता हूँ ।
जी हाँ हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूँ ।
डा. कुमार विश्वास आज जोधपुर मे
आज हिन्दी कवि सम्मेलनो के सबसे चर्चित युवा गीतकार डा कुमार विश्वास जोधपुर मे है और शाम को ६ बजे एस एल बी एस कालेज मे उनका कार्यक्रम है. पहले मुलाकात हुई हवाई अड्डे पर फिर राजपूताना होटल के उनके कमरे मे. शाम को उनका कार्यक्रम है. मुलाकात का शेष भाग उसके पश्चात ब्लोग पर लिखेगे.
उनके स्वागत मे उन्ही का एक नया गीत प्रस्तुत है.
फिर बसंत आना है
डा. कुमार विश्वास
तूफ़ानी लहरें हों
अम्बर के पहरे हों
पुरवा के दामन पर दाग़ बहुत गहरे हों
सागर के माँझी मत मन को तू हारना
जीवन के क्रम में जो खोया है, पाना है
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है
राजवंश रूठे तो
राजमुकुट टूटे तो
सीतापति-राघव से राजमहल छूटे तो
आशा मत हार, पार सागर के एक बार
पत्थर में प्राण फूँक, सेतु फिर बनाना है
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है
घर भर चाहे छोड़े
सूरज भी मुँह मोड़े
विदुर रहे मौन, छिने राज्य, स्वर्णरथ, घोड़े
माँ का बस प्यार, सार गीता का साथ रहे
पंचतत्व सौ पर है भारी, बतलाना है
जीवन का राजसूय यज्ञ फिर कराना है
पतझर का मतलब है, फिर बसंत आना है
Tuesday, March 23, 2010
नक्सलवादी आंदोलन के संस्थापक कानू सान्याल नही रहे
आज के समाचर पत्रो की छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण खबर है कि नक्सल आन्दोलन के जनक और सच कहे तो स्वतन्त्र भारत के सबसे सन्घर्षशील व्यक्तित्व कानू सान्याल नही रहे.उनका शव हाथीघीसा स्थित उनके घर में रस्सी से लटका हुआ पाया गया. पुलिस मान कर चल रही है कि पिछले कुछ समय से विभिन्न बीमारियों से परेशान कानू सान्याल ने आत्महत्या की है यह सोचकर तो दिमाग का दिवाला निकल गया कि इस महा नायक ने आत्म हत्या की. मुझे यकीन नही होता.
अन्य साम्यवादी नेताओ की तरह कानू सान्याल बहुत पढे लिखे नही थे. १९२९ मे जन्मे कानू ने मैट्रिक १९४६ मे किया और जब इन्टर्मीडियेट कर रहे थे तो पढाई छोड दी. उसके बाद उन्हें दार्जीलिंग के ही कलिंगपोंग कोर्ट में राजस्व क्लर्क की नौकरी मिली. लेकिन कुछ ही दिनों बाद बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.
जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात चारु मजुमदार से हुई. जब कानू सान्याल जेल से बाहर आए तो उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली. 1964 में पार्टी टूटने के बाद उन्होंने माकपा के साथ रहना पसंद किया. 1967 में कानू सान्याल ने दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की. कानू सान्याल और चारु मजुमदार ने मिल कर बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन चलाया था, जिसके बाद वह आंदोलन पूरे देश में नक्सल आंदोलन के नाम से जाना गया.
24 मई 1967 को जिस आंदोलन की आग उन्होंने जलाई थी, वो आग आज भी उनके भीतर धधकती रहती थी. यही कारण है कि इस उम्र में भी वे गांव-गांव जाते थे, बैठक करते थे, सभाएं लेते थे. दार्जीलिंग के नक्सलबाड़ी से लगे हुए एक छोटे से गांव हाथीघिसा में अपने एक कमरे वाले मिट्टी के घर में रहने वाले कानू सान्याल की नज़र बस्तर से लेकर काठमांडू तक बनी रहती थी. हर खबर से बाखबर !
उनकी राय है कि भारत में जो सशस्त्र आंदोलन चल रहा है, उसमें जनता को गोलबंद करने की जरुरत है. अव्वल तो वे इसे सशस्त्र आंदोलन ही नहीं मानते. छत्तीसगढ़, झारखंड या आंध्र प्रदेश में सशस्त्र आंदोलन के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वे इसे “आतंकवाद” की संज्ञा देते हैं. वे नक्सलबाड़ी आंदोलन को भी माओवाद से जोड़े जाने के खिलाफ हैं. वे साफ कहते हैं- There is no existence of Maoism.
वो मानते थे कि जनता ही केवल देश की शक्ति है. वो जनता अगर आपको साथ ना दे तो आप आगे नहीं बढ़ सकते हैं. और विशेषकर के मजदूर और उनका सबसे दृढ़ सहयोगी जो है किसान, उनकी संख्या भी सबसे ज्यादा है. वो अगर उनका साथ ना दे तो ये संग्राम टिक नहीं पाएगा.
नक्सल्वादी आन्दोलन शुरू होने के दिनो को याद कर वो बताते थे कि अपने बडे नेताओ से वो जानना चाह्ते थे कि सत्ता मे आने पर वो जनता के लिये, मजदूरो के लिये, किसानो के लिये और गरीबो के लिये क्या क्या करेगे ये बताया जाये. उन्हे जबाब मिलता था - चुनाव तो जीतने दो आगे तब देखा जाएगा. भारत में उस समय 9 प्रांत में कांग्रेस खत्म हो गयी थी, यानि सत्ता से उखाड़कर फेंक दी गयी. लेकिन उन्हे अनुभव हुआ कि ना तो कांग्रेस, ना तो कम्यूनिस्ट पार्टी जो अपने आप को मजदूर किसान का हिमायती करती है. उनका कोई political will, (will) वो इस बात पर जोर देना चाहते थे, कभी भी नहीं थी, आज भी नहीं है.
फिर किसानो के बीच जाकर उन्होने कहा -
देखिए शांतिपूर्ण रूप से होगा नहीं हम लठ से, तीर धनुष से, बंदूक राइफल से लड़ नहीं सकते. तो naturally आपको तीर धनुष लेके शुरु करना होगा और बंदूक आपको अपने हाथ में लेना होगा. हम लोग ये बात सीखा करते थे कि हमारी बंदूक पुलिसों के हाथ में है, हमारी बंदूक मिलिटरी के हाथ में है. ये हमारे है, हमारे पैसा से है. पुलिस बजट में खर्चा होता है, मिलिटरी बजट में खर्चा होता है, ये हमारे पैसों का है, हम संगठित नहीं है. इसलिए बंदूक उनके हाथ में है. वो बंदूक हमारे हाथ में लेना है. अगर आप जमीन का रक्षा काहे कि अगर यहां कि भूमि व्यवस्था को आप पलटना चाहते हैं तो ये व्यवस्था का बात आ जाता है और जब व्यवस्था का बात आ जाता है तो वो चुपचाप बैठने वाला नहीं है. वो चुपचाप नहीं बैठेगा, वो आपके उपर दबाव बनाएगा.
पार्टी को जब छोड़ा तब के बारे मे कानू बताते है - 1964 में सीपीएम ने थे. तो सीपीएम में, अंदर में revisionist leadership के विरोध में लड़ने लगे. एक तो दूसरी बार जेल गये. जब भारत-चीन युद्ध हुआ तो सरकार को ये डर था कि ये क्रान्तिकारी दल बन रहे है. बंगाल में उन समेत ८ आदमी की गिरफ्तारी हुई थी. प्रमोद दा भी उनके बीच गिरफ्तार हो गए थे और वे इस कारण से पार्टी कोन्ग्रेस मे भाग नही ले पाये थे. उस सम्मेलन के बाद उन लोगो को ये साफ़ हो गया था कि ये पार्टी (सी पी एम ) कुछ करने वाली नहीं है.
उसी समय सितंबर महीने में आनंदबाजार पत्रिका में एक खबर आयी कि चारु मजूमदार ने एक लेख लिखा है जिसमें सशस्त्र सन्घर्ष का आह्वान किया है. तो हम लोगों ने वो लेख पढ़ा जेल में तो हम उससे असहमत थे. फिर हम 66 में जेल से रिहा होकर आए और आने के बाद उनसे बातचीत हुई. हम लोग बोले - देखो हम आपके साथ सहमति रखते हैं कि सशस्त्र सन्घर्ष करना है. लेकिन इसके लिए जनता तो आपके साथ में होना चाहिए. आप जनता को बताये कि यह जनहितकारी सुधारात्मक आन्दोलन है. प्राथमिक सन्गठन को आप छोड़ दीजिएगा तो आप जनता से कट जाइएगा. तो हम लोग बोला कि हम लोग एक साथ लड़ेंगे सुधारवाद के खिलाफ में. और हम लोग दो जगह चुनाव कर लें. आप अपने दस्ते को प्रयोग में लाएंगे. हम भी अपने जिला में दार्जिलिंग जिला में अमल में लाएंगे. किसी आदमी को षडयंत्रकारी कायदा से मारने से व्यवस्था खत्म नहीं होती. हां लड़ाई के मैदान में बोलिए व्यवस्था को मारने के लिए राइफल हाथ में लो, बंदूक जुगाड़ करो, बंदूक लूटो, ये अगर बोलें तो ये समझ में आता है. लेकिन क्या वास्ते बंदूक लूटेंगे, आपका कार्यक्रम होना चाहिए, मजदूर के लिए, किसान के लिए वो ही तो इस देश की संख्या है. वो ही लोग अगर इस संग्राम में नहीं रहेगा तो कैसे कर के हमारा संग्राम आगे बढ़ेगा. नक्सलबाड़ी का संर्घष इसी का परिणाम है.
ये जो आंध्र में, छत्तीसगढ़ में, झारखंड में ये जो हथियारबंद आंदोलन चल रहे हैं उनके बारे मे कानू सान्याल कहते हैं कि ये आतन्कवादी हैं. वे मुख्य रूप से पैसे, बन्दूक और आतन्क पर निर्भर करते है. ये लोग आदमी को धमकी देकर पैसा देकर, पैसे वाले को अदा करते हैं कि कुछ कर रहे हैं. जनता को साथ लिये बिन ये लडाई सफ़ल नही होगी.
अपने जीवन के लगभग 14 साल कानू सान्याल ने जेल में गुजारे. इन दिनों वे भाकपा माले के महासचिव के बतौर सक्रिय थे और नक्सलबाड़ी से लगे हुए हाथीघिसा गांव में रह रहे थे. दो साल पहले लकवाग्रस्त होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था. लेकिन इसके बाद उन्होंने कहीं भी भर्ती होने से इंकार कर दिया था.
डिस्क्लेमर :
इस लेख के अधिकतर तथ्य http://www.raviwar.com पर आये लेख और रविवार पर ही प्रकाशित बातचीत से लिये गये है.
इस लेख का मकसद नक्सलवाद को बढावा देना नही है बल्कि नक्सल्वाद को समझने और कानू सान्याल के उस नक्सली चिन्तन के आदर्श को समझने का प्रयास किया है जिसके लिये वो जीवन के अन्त तक सन्घर्ष की राह पर चलते रहे और एक जीवन्त मिथक के रूप मे चर्चित् रहते हुए भी जिसने एक झोपडी मे अपना पूरा जीवन गुज़ार दिया.
हम हर तरह की हिन्सा की निन्दा करते है लेकिन कामना करते है कि समाज इतना समतावादी हो और देश मे इतना अमन चैन और खुशहाली हो कि देश मे किसी को भी इस राह पर चलने की इच्छा ही पैदा ना हो.
लघु सन्देश सेवा (SMS) से प्राप्त चुटकुले और सन्देश
मोबाइल पर प्रतिदिन ढेर सारे SMS सन्देश आते है कोशिश कर रहा हू कि आगे से सभी सन्देश अपने ब्लोग पर हिन्दी मे लिखकर आप सभी के साथ बाट लू. मेरा यह प्रयास कैसा लगा? टिपिया कर जरूर बताये.
आप........
रम की तरह मजबूत है.
रम की तरह मजबूत है.
शराब की तरह अच्छे है
बियर की तरह ठंडे है
व्हिस्की की तरह क्लासिक है
वोदका की तरह परिष्कृत है
संक्षेप में,
मैं आपकी दोस्ती में पूरी तरह से टुन्न हूँ
हरि शर्मा, जोधपुर
( चित्र देवदास फ़िल्म मे शाहरूख खान का गूगल से साभार )
Sunday, February 28, 2010
होली पर ब्लोगर्स की झान्की
बुरा ना मानो होली है
होली पर नजीर अकबरावदी जी की इस गज़ल से अधिक सार्थक मुझे कुछ भी नही नज़र आता. इसलिये आज की बात यही से शुरु कर रहा हू. बहुत बार ऐसा होता है कि हम होली पर अपने चिर परिचित परिवेश से दूर होते है तब नज़ीर जी के बनाये हुए इन शब्द चित्रो से ही होली की मस्ती और उसके रन्गो को महसूस किया जा सकता है. अगर फ़ागुन नही होता तो होली इतनी मस्ती का त्योहार होता या नही? चलो फ़ागुन भी होता और डफ की थाप नही होती और ये भी होता तो अगर कोई परी नही होती तो क्या हम ऐसे ही होली पर नशे मे धुत्त होकर रन्ग भरी पिचकारी से किसी की अन्गिया भिगो रहे होते. चून्कि ये सब है और जीवन खुद मे एक रन्गीन उत्सव है कुछ हल्के रन्ग है तो कुछ चटख रन्ग है ऐसे ही जैसे दुनिया रन्ग बिरन्गी है वैसे ही हमारे ब्लोग जगत के ब्लोगर भी रन्ग बिरन्गे है. आओ आनन्द ले इस रन्गीन दुनिया के रन्गीन ब्लोगर्स के साथ शाब्दिक मस्ती का -
ब्लोग जगत के सारे ब्लोगर गागर मे भर देते सागर
ब्लोगर अनूप शुक्ला थोडी सी मौज क्या ले ली, जमाना रूठ गया
हम तो दीवाने थे ही जमाना दीवाना हो गया
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ब्लोगर समीर लाल आसमान से आया फ़रिस्ता ब्लोग का सबक सिखलाने
उडनतस्तरी पे बैठ के आता सबकी पोस्ट पे टिपियाने
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ब्लोगर ललित शर्मा फ़ौजी जैसा वेश है लम्बी लम्बी मूछ
जिसकी जितनी मूछ है उसकी उतनी पूछ
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ब्लोगर बी एस पाबला तकनीकी उस्ताद है करते पर्दाफ़ास
ऐरी गैरी समस्या नही फ़टकती पास
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ब्लोगर अनीता कुमार मेरे ब्लोग को जिन्दगी देने वाली
कभी तो मिलोगी नवी मुम्बई वाली
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ब्लोगर सन्गीता पुरी ब्लोग जगत मे सभी का स्वागत करती आप
ज्योतिष विद्या मे निपुण मुझे बता दो जाप
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ब्लोगर अविनाश वाचस्पति हम ब्लोगर मिलन कर करके सनम
लिखते भी रहे पढते भी रहे
ब्लोगर सन्गठन की बात क्या कर दी भाई
कुछ लोग जुडे कुछ रूठ गये तो रूठ गये
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ब्लोगर अजय झा मै ब्लोगिन्ग का इन्द्रजीत हू नही किसी से डरता हू
कौन है कितने पानी मे सबकी रिपोर्टिन्ग करता हू
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ब्लोगर दिनेश राय द्विवेदी सरदार ने जहा ला के पटका है
अनवरत का वही पर झटका है
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ब्लोगर महफ़ूज़ अली अरे......... रूकना ए हसीनो लो मै आ गया
पडे जो जरूरत लाठी बल्लम लेके आ गया
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राजीव - सन्जू तनेजा किसकी फोटो कहा चेप दे कलाकार ये पर भारी है
डरे सिर्फ़ सन्जू भाभी से और सभी से यारी है
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ब्लोगर रश्मि रवीजा मेरी पोस्ट की उमर हो इतनी जरूर
टीपो या ना टीपो पर इसे पढिये जरूर
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ब्लोगर वन्दना दुबे कहती है कुछ खास नही, बस किस्सा और कहानी
लिखती है जैसे जीवन हो शब्दो से करती मनमानी
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ब्लोगर शिवानी सबसे पहले आप ने करी टिप्पणी खूब
बहुत दिनो से ना दिखी अरे मखमली दूब
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ब्लोगर धीरेन्द्र "काफ़िर" गीत गज़ल कविता मे तू पारन्गत है ये माना
बाकी दुनिया ने तुझको मुम्बई वाउन्ड से जाना
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ब्लोगर सन्जय व्यास मेरा ब्लोग मेरी सोच का सच्चा दर्पण है
जो भी सीखा जीवन मे सब यझा अर्पण है
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ब्लोगर हेम ज्योत्सना व्यस्त हो गये काम मे मिले नही अब वक्त
होली पर जरूरत पडी हेम ज्योति की सख्त
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ब्लोगर प्रगति सदा प्रगति के मार्ग मे आते है अबरोध
साधक साधे साधना हटते है गतिरोध
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ब्लोगर डा. एस के मित्तल उद्यम मे अब्बल रहे राष्ट्र धर्म मे लीन
गौसेवा करते रहो कभी ना हो गमगीन
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ब्लोगर अमन पढने मे होशियार है कविता मे उस्ताद
पहले कैरियर बना लो सीख रखो ये याद
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ब्लोगर अनुराधा श्रीवास्तव बडी बहिन सी सीख दे कविता को दे दाद
लगता है कुछ व्यस्त है आती हमको याद
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ब्लोगर नाम देव-ज्योत्सना पान्डे दिन भर आफ़िस मे फ़से थके थके है सन्त
ज्योति बिखेरे ज्योत्सना कविता मे गुण्वन्त
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ब्लोगर सूर्य कान्त गुप्ता नित्य रेल से यात्रा घुमदत खूब बिचार
सन्गत का भी असर है धूम मचा रहा यार
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ब्लोगर योगेश सम्दर्शी शब्द स्रिजन से ढूढते नित नये समाधान
राष्ट्र प्रेम से प्रेरणा कलम से सर सन्धान
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ब्लोगर आवेश तिवारी तेवर तीखे खूब है झुकना ना मन्जूर
माल उडाते दलाल और कष्ट उठाते शूर
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ब्लोगर राजीव जैन सिखा रही है जिन्दगी रोज नये ही पाठ
चीरफाड कर लिखे की खोल रहे ये गान्ठ
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ब्लोगर प्रकाश बादल वन बिभाग का काम है पर उलटा - सुल्टा नाम
बादल होन्गे जिस जगगह क्या प्रकाश का काम
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दिगम्बर नासवा नाम दिगम्बर रखा पर कपडे पहने चार
इस पर भी कुछ बता दो अपने शुद्ध विचार
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ब्लोगर अनिल कान्त कह दो जो कहना है अब काहे डरना है
क्यू चिन्ता मुखौटा इक रोज उतरना है
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ब्लोगर श्रद्धा जैन श्रद्धा तुम सच मे श्रद्धा हो अन्तरजाल के इस नभ मे
हर वक्त गज़ल सी लिखी रहो हर ब्लोगर के मन मे
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ब्लोगर शोभना चौधरी पढने ही पढने मे मैने जीवन हाय बिता डाला
दूर अभी है पर कहत है हर पथ बतलाने बाला
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Friday, February 26, 2010
सचिन ने नहीं बेलिन्डा क्लार्क ने लगाया पहला एकदिवसीय दोहरा शतक
इस फोटो को ध्यान से देखिये ये क्रिकेट की मशहूर खिलाडी बेलिंडा क्लार्क है जिन्होने १९९७ के महिला क्रिकेट विश्व कप मे मुम्बई मे २२९ रन नाबाद बनाये थे और इस तरह एक दिवसीय क्रिकेट का पहला दोहरा शतक लगाने वाली बल्लेबाज बनी. अब जब सचिन तेन्दुलकर ने ये उपलब्धि हासिल कर ली है तो मीडिया यही राग गा रहा है कि वे एक दिवसीय क्रिकेट के पहले दोहरा शतक बनाने वाले बल्लेबाज है.
यकीनन सचिन ने जो उपलब्धिया हासिल की है उनके लिये सचिन ही नही हम सभी भारतवासी गर्व महसूस करेगे पर जब जिम्मेदार मीडिया तत्थात्मक गलती किये जा रही है तो उस महिला की चर्चा करना समयानुकूल है जिसने ये उपलब्धि पहले बार हासिल की. सही तथ्य यही है कि सचिन एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मैच मे शतक बनाने वाले पहले पुरुष बल्लेबाज है.
सचिन की उपलब्धियो पर तो जितन भी लिखो कम ही है लेकिन आओ हम थोडी जानकारी बाटे बेलिंडा क्लार्क के बारे मे. -
10 सितम्बर 1970 को जन्मी बेलिन्डा क्लार्क ने १९९१ से २००५ तक आस्ट्रेलिया के लिये क्रिकेट खेली और वो १९९४ से २००५ तक आस्ट्रेलिया महिला क्रिकेत टीम की कप्तानी थी. उन्होने लम्बे समय तक आस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट मे मुख्य कार्यकारी अधिकारी की भूमिका भी निभाई जिससे हमे उनके आस्ट्रेलियाई क्रिकेट मे योगदान का पता चलता है. उन्हे १९९८ मे बिजडन ने बर्ष की सर्वश्रेष्ठ आस्ट्रेलियाई खिलाडी माना. २००५ मे खेल से सन्यास से पहले इन्होने कुल १५ टैस्ट और ११८ एक दिवसीय मैच खेले और १०१ मैचो मे कप्तान रही. उन्होने अपने खेल और कप्तानी से ये सुनिश्चित किया कि आस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट टीम भी पुरुषो की तरह दुनिया मे सबसे मजबूत रहे.
महान आस्ट्रेलियाई विकेट कीपर बल्लेबाज एडम गिल्क्रिस्ट के साथ
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