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Saturday, August 22, 2015

जिन्दगी से ये सब चाहा तो नहीं था - हरि शर्मा


तुम जब थी तो जीवन में
फूल ही फूल महक रहे थे
मुझे तुमसे प्यार था
ये कभी कह तो नहीं पाया
पर प्यार तुम्ही से था
यह जान लेना कठिन तो नहीं था

स्मृतियों का दर्द  दफ़न है सीने में
मेरी हर सांस में तुम हो
मेरी आँखों में जो नेह की चमक
सभी देखते हैं वो तेरे लिए है
इस बात को समझना ये जानना
किसी के लिए आसान  तो नहीं  था   

तुम्हे खोकर में जी रहा हूँ
या मना रहा हूँ मातम जिंदगी का
हर बर्ष इस मातम की सालगिरह आती है
और में खुद से शर्मिन्दा होकर
तुम्हारा अपराधी बना ज़िंदा हूँ
जिन्दगी से  ये सब चाहा तो नहीं था
इंदिरा की याद - हरि शर्मा रचित – सोमेश्वर १०.०७.१२