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Monday, July 18, 2011

लड़कियां पतंग उडाती हैं


लडकियां उडाती हैं पतंगे
लेकिन चरखी कोई और पकड़ता है
वो डोर पकड़ती है
पतंग को छुट्टी कोई और देता है


वो पतंग तो उडाती हैं
तंग कोई और ही बांधता है
या वो उडाती हैं
पतंगे जो कटके छत पे आती हैं


उनकी पतंग उडती भी है
आकाश में लेकिन
घरवालेआगाह करते हैं
पेच ना लड़ाने की सीख देते हैं


जो लडकियां पतंग उडाती हैं
तो उनसे ये भी कहा जता है कि
भले कोई ढील दे
तुम्हें अपनी डोर खीचके ही रखनी है


हाँ लड़किया पतंग उडाती है
पर क्या पता उसे आसमान निगलता
या धरती खाती है
शाम होते गगन में आवारा पतंगे रहती हैं

Tuesday, October 26, 2010

एक मुलाक़ात सुप्रसिद्ध गीतकार सोम ठाकुर से


हिन्दी और बृज भाषा के सुप्रसिद्ध गीतकार श्रद्धेय सोम ठाकुर पिछले दिनों जयपुर आये. गीत चांदनी कवि सम्मलेन जो कि देश में अपनी तरह का अकेला आयोजन है और तरुण समाज प्रति वर्ष शरद पूर्णिमा के बाद के शानिवार की रात को आयोजित करता है.  उसमें अन्य गीतकारो के साथ .अपने संस्कार, माधुर्य और राष्ट्रीय चेतना से भरे गीतों को अपने मीठे कंठ से गाकर मुग्ध करने वाले सोम जी इस कवि सम्मलेन का  आकर्षण थे.

कवि सम्मलेन की समाप्ति पर जैसे कि मेरी आदत है अपने मनपसंद कवियों से मिलने की, तो मैं सोम जी से भी मिला और जब पता चला कि वो रविवार को जयपुर ही रुकेंगे तो मैंने उनसे एक ब्लॉग साक्षात्कार के लिए निवेदन किया जिसके लिए उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी.  

ये ब्लॉग साक्षात्कार रविवार २४.१०.२०१० को मेरे निवास पर हुआ और उससे पहले कवि सम्मलेन की एक घटना बताना चाहता हूँ. मेरी आदत है कि जो कवि मुझे पसंद हैं,  उनके गीत की पंक्तियाँ या गीत नही मैं पूरे कवि को याद कर लेता हूँ. यहाँ पूरे कवि से मतलब उनकी लोकप्रिय रचनाये. ये कहानी श्री आत्म प्रकाश शुक्ला जी  से शुरू हुई फिर बच्चन जी,  नीरज जी, सोम जी, डा. कुमार विश्वास, डा. विष्णु सक्सेना, कुंवर जावेद तक पहुँची है. तो सोम जी अपने जागरण गीत पर अटक गए. थोड़ी देर प्रयास किया याद करने का फिर मैंने जोर से बोलकर उन्हें आगे की पंक्तिया याद दिलाये और उन्होंने गीत पूरा किया. यही घटना २००० की गीत चांदनी में कुमार विश्वास के साथ भी हुई थी. तब डा. कुमार विश्वास अपनी अचर्चित रचना रूपा रानी बड़ी सयानी ........ को बीच में भूल गए तो थोड़ी देर बाद मेरे से बोले कि शर्मा जी बताइये ना आगे क्या है. ऐसी घटनाए जिन्दगी भर याद रहती हैं. अभी के लिए श्री सोम ठाकुर जी का ये नवगीत पढ़िए. अगली पोस्ट में सिर्फ उनसे मुलाक़ात पर बात होगी. 
  

   




Sunday, June 6, 2010

यादें : कैसे लगी ये नौकरी - हरि प्रसाद शर्मा




आज भी मेरी स्मृति में अपने उस साक्षात्कार की यादें ताजा हैं जो उस नौकरी में आने का ज़रिया बना जो मैं आज कर रहा हूँ। साक्षात्कार से पहले लिखित परीक्षा होती है और उसे पास करने के लिए उसमें बैठना पड़ता है। हम शुरू से ही एक अगंभीर तबियत के मालिक थे।


जब ये परीक्षा देनी थी तब एक नौकरी के लिए चुन लिए गए थे इसलिए गंभीर होने का कोई विशेष कारण भी तो नहीं था। परीक्षा के लिए अपने कुछ दोस्तों के साथ मस्ती करते हुए रेल से कोटा गए। वहा सवेरे चाय नाश्ता किया। अपने-अपने प्रवेश पत्र निकाले और परीक्षा केंद्र का पता किया और अपने-अपने परीक्षा केंद्र की तरफ निकल गए। परीक्षा केंद्र पहुंचे तो सूचना-पट पर रोल नंबर देखने को प्रवेश-पत्र जेब से निकाला। कागज़ हाथ में था और पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही थी। मेरे हाथ में दोस्त का प्रवेश पत्र था। इसका मतलब ये हुआ कि मेरा प्रवेश पत्र दोस्त के हाथो में था।
मन को ये समझाकर कि अब इस परीक्षा में बैठना नामुमकिन है एक प्रयास करने की सोची और दोस्त के परीक्षा केंद्र की तरफ के ऑटो में बैठ गया. उसके केंद्र तक जाने के लिए बीच मे ऑटो बदलना था. जैसे ही ऑटो से उतरा, ऐसा लगा जैसे आधी रात को सूर्य निकल आया हो,सामने के ऑटो से दोस्त उतर रहा था. दोनों ने बिना बात किये प्रवेश पत्र बदले और उसी ऑटो बाले को अपने ने सेंटर चलने को कहा. जब परीक्षा केंद्र पहुचे तो बाहर सन्नाटा था. तुंरत अपना कमरा पता किया और जा बैठे.
तो परीक्षा हो गयी बढिया और बाद में परिणाम भी आया लेकिन क्या है की अपन गीता से प्रेरणा लेकर कर्म करने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। परीक्षा दी और भूल गए। जब अखवार में परिणाम आया तो हमने देखा ही नहीं देखते कहा से रोल नंबर थोड़े लिखके रखा था। खैर जिसका कोई नहीं उसका ऊपर बाला तो है डाक से आने बाली सूचना भी इधर उधर भटक के हम तक पहुची और पता लगा कि हम पास हो गए हैं। पुराने अखवार देखे तो वहा भी रोल नंबर मिल गया। दूसरी नौकरी पहले से पक्की थी.

पिताजी रोज शाम को ज्ञान देते ऐसे प्रश्न तैयार करो, ये भी और वो भी। हमारा दिमाग कुछ और ही सोच रहा था। साक्षात्कार के दिन सवेरे कोटा, जहा नवरंग होटल में साक्षात्कार होना था पहुचे। वही अपुनका पुराना तरीका। चाय पी ढावे पे और फिर आगे जाकर रेस्तरा में नाश्ता किया और पानी से बाल भिगोके सँवारे ( कुंवर बेचैन जी की कविता - तालाबों में झाँक संवर जाते थे हम ) और पहुच गए साक्षात्कार देने। वहां जितने भी साथी ( काहे के साथी प्रतियोगी थे सब ) थे वो सब बने ठने अप-टू-डेट, चमकते चेहरे, टाई पहने जामे हुए थे। जिसे पूछो हमसे ज्यादा पढा लिखा। एक बार तो लगा कि भाई फूट ले यहाँ से लेकिन फिर सोचा कि खोने को क्या है? हमारा नंबर आया। अंदर बुलाया, कमरे मे घुसे तो बैठने को कहा और अपुन थैंक्स कहके बैठ गए।

पहला बोला - शर्मा जी आपने अपने बायो-डाटा में होबीज में क्रिकेट लिखा है, बतायें आप क्रिकेट खेलते हो? कमेंट्री सुनते हो? क्रिकेट देखते हो? या कमेंट्री करते हो?मैंने जवाब दिया - सर, मैं क्रिकेट खेलता भी हूँ, क्रिकेट देखता भी हूँ, कमेंट्री सुनता भी हू और कमेंट्री करता भी हूँ ।

दूसरा बोला - अच्छा फिर तो आप क्रिकेट के एक्सपर्ट हुए। मैंने तपाक से कहा - नो डाउट सर

एक धमाका सा हुआ कमरे में - वो सब कुर्सी पर बैठे बैठे हिल गए )

फिर थोड़ी देर मैं एक बोला - अच्छा बताओ गुगली और चाएनामेन में क्या फर्क है? वो मैंने बता दिया दूसरे ने पूछा पुल और ड्राइव मे क्या फर्क है वो भी बता दिया। फिर क्रिकेट पर हल्की फुल्की बात की उसी समय गावस्कर- कपिल देव विवाद हुआ था उस पर बात हुई।

अगला सवाल आया - आपके पास स्नातक में हिंदी विषय रहा है। मैंने कहा जी हाँ रहा तो है।

बोला - हिंदी के एक कवि हुए हैं। मैंने कहा बहुत हुए हैं साहब।

बोला - बच्चन का नाम सूना है? मैंने कहा - खूब सूना है साहब।

बोला - उन्होंने एक किताब लिखी है मैंने कहा - बहुत सी लिखी है साहब।

बोला - मधुशाला पढी है? मैंने कहा पढी है साहब।

बोला - कुछ सूना सकते हो मधुशाला मे से? मैंने कहा कहाँ से सुनाऊं साहब?

बोला - कही से सुना दो। मैंने फिर जो रिकॉर्ड पे पहले कविता बजती है वो सुनाई -

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीने बाला,

किस पथ से जाऊं असमंजस में है बह भोलाभाला।

अलग अलग पथ बतलाते सब पर में यह बतलाता हूँ,

राह पकड़ तू एक चलाचल पा जाएगा मधुशाला।

एक बोला ये बताओ ये सिर्फ शराब की बात हो रही है या कोई और अर्थ भी है? मैंने कहा साहब, ये मधुशाला जो है प्रख्यात सूफी संत उमर खय्याम की कल्पना है। ये मस्ती का दर्शन है। जब गांधी जी ने बच्चन जी को कहा की तुम ये क्या मदिरा का प्रचार करते फिरते हो तो बच्चन जी ने ये जवाब दिया था की सर में तो शराब की बात ही नहीं करता. में तो इसमे ये कहता हूँ की -हर धर्म का आदमी मोक्ष प्राप्त करने की कामना करता है। लेकिन उसे यह पक्का पता नहीं है की किस धर्म के रास्ते पर चलकर उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी। सभी धर्मो के ठेकेदार उसे अलग अलग रास्ते बताते हैं लेकिन मेरा ये कहना है - तू कोई भी एक राह पकडके चलता जा तुझे मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी।

इसके बाद उन्होंने थोडा राजनीति पर बात की, राजीव गांधी २१वी सदी की बात कर रहे थे नए जोश मे थे उस पर कुछ बात की। फिर उन्होंने बहुत गर्मजोशी से मुझे विदा किया और सभी ने शुभकामना दी। ६ दिन बाद ही इसका परिणाम आ गया और मैंने कोटा केंद्र से प्रथम स्थान प्राप्त किया।

जिसे मैंने खेल समझा - वही जिन्दगी की किताब बन गयी ।


हरि प्रसाद शर्मा
77  / 101,
अरावली मार्ग, मानसरोवर,
जयपुर 
302020
 फ़ोन - 09509362347, 09680890951