Monday, October 12, 2009

गरबा की रात में





गरबा की रात में
थिरकते हैं बदन
और नाचती है गोरियां
दमकते रूप की
भभकती आंच में
हुस्न बिखरा पड़ा है

बच्चों का झुंड
और उनकी चिल्ल-पों में
डूबा मेरा मन
उनकी इस मासूमियत में
मुझे लगे जैसे मेरा
बचपन बिखरा पड़ा है

छलकते जाम खनकती बोतलें
मदिरा के उस नशे में
साकी के महकते इतर में
हलके गहरे धुंए में
टूटे कांच के टुकडों में
मेरा वजूद बिखरा पड़ा है

बारिश नहीं, एक और अकाल
प्यासी धरती की दरारों में
बूढी धंसी आँखों में
दमे की खुल्ल-खुल्ल में
बिवाई से रिश्ते मवाद में
मेरा भारत बिखरा पड़ा है

--शैलेष मंगल


Saturday, October 3, 2009

विजयी भव!!!!

न अबला बन न ह्त्या कर
नारी जन जो जना हैं नर
न घात से डरप्रतिघात कर
मर्म पर आघात कर
स्व लघु कर आत्मा विराट कर
वार कर प्रहार कर
व्यक्तित्व कर प्रखर
ना प्यार कर ना दुलार कर
ना बन करुनाकर
जगत में व्याप्त अनाचार
चढा निज पर तीक्ष्ण धार
संचित कर मनोबल अपार
विजयी भव भवसागर कर पार

Friday, October 2, 2009

ग्रीन चैनल अवार्ड फ़ोर ए़क्सीलेन्स-२००८




जब जीवन मे़ लगता था
निराशा के घने मेघ
बहा दे़गे सब मेरा
लाख करो कोशिश पर
लगता था हुआ तबाह
निरर्थक हुए सब प्रयास
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खन्जर से छलनी सीना
हो गया लहूलुहान
खुद से विश्वास उठा
होती पीडा महान
लगता था जैसे कि
भूल गया सब अभ्यास
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लेकिन कोई तो है
देख रहा दूर खडा
कौरवी कुचालो़ को
चौसर मे़ हार रहे
पान्डव कुमारो को
शकुनी की चालो़ को
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दुख की काल्री राते
बीत गयी बात गयी
नियति ने पर्दा उठा
कर दिया जयघोश
जीते तुम आर्यपुत्र
ये सब तो माया थी
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आन्खो़ मे़ विस्मय था
मन मे़ अविश्वास सा
लेकिन हम जीते थे
ये ट्राफी जीती तो
ये सबने माना था
सच कितना अपना था

Friday, September 4, 2009

सब जगह बिखरा पडा है




लोग तो परेशान हैं कि
जब घर में घुसो देखो
शयनकक्ष से लेकर के
बाहर की बैठक तक
यहाँ वहां सब जगह
सामान बिखरा पडा है
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रातों में नभ निहारो
निशा की रियासत में
सैनिक बन दमक रहे
तारे हैं टिमटिमा रहे
राजा से चन्द्रमा का
प्रकाश बिखरा पडा है
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दुनिया में घृणा देख
व्याकुल हुआ कवि मन
युद्ध की तो कौन कहे
घरेलू मसलों पर ही
इंसानियत मर रही है
खून बिखरा पडा है
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जीवन भी देखो ना
माटी के पुतले में
साँसों का डेरा है
आस का पखेरू है
उसमें भी सपन मेरा
टूटा बिखरा पडा है
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हरि शर्मा

Sunday, August 30, 2009

मंदी

कुछ और रोजगार छूटे
कुछ और घरों की नीलामी हुई
बस इतनी सी बात हुई और
मेरे देश में दिन की शुरुआत हुई


मंदी का ये दुर्योधन मानो
द्रौपदी सी अर्थव्यवस्था की
इज्ज़त हरने को आतुर है
और ओबामा बने कृष्ण
संकट में हैं कहाँ से लायेंगे
इतना बेल-आउट का चीर
आर्थिक मंदी ने झकझोरा सबको
किसी को ज्यादा किसी को कम
कुछ तो झटका झेल गए
तो कुछ ने लगाया अपने
मंदी से घबराकर अपने
जीवन पर पूर्ण विराम


आशा भी डूबती जाती है
आख़िर कब लेगी
यह तंगी थोड़ा विश्राम
किस दिन उगेगा वो सूरज
जिसकी किरणे करेंगी
इस दानव का काम तमाम

कहतें है समय बड़ा बलवान
और है हर मर्ज की दवा
दो गोली संतुष्टि की
सुबह शाम खाओ और
सुनो हमारा भी नुस्खा
बुरा वक्त तो निकल जाएगा
पर तुम धीरज न खोना
नौकरी जाए या फिर
व्यापर क्यो ना डूबे पर
आस का साथ न छोडना
कभी तो होगा ही भइया
इस काली रात का अवसान

( शैलेश मंगल )

Tuesday, July 7, 2009

कदम्ब का पेड़


कालंदी नदी तट पर पेड़ है कदम्ब का
श्याम की बन्शी से झुक गयी थी डाली
श्याम फूल चुन करके
राधा का जूडा सजा मन्द मन्द मुस्काते थे
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रसखान बोले कि मानव जनम मिले
कदम्ब के पेड हो, कालिन्दी बह्ती हो
ऐसी जगह जन्मू
यशोदा के लाल जहा राधिका को नचाते है
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महिमा भी जान लो कदम्ब के पेडन की
फूलो से इत्र बने पत्ती को कूटने पर
दवाओं के सेवन से
डाईबिटीज जैसे भी रोग नष्ट हो जाते है
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लम्बे और फ़ैले से, अति सुन्दर पेड हॊतॆ
मनभावन फूल जिसके, जड से पत्ती तक
फूल से टहनी तक
ऐसा ना कुछ भी जो काम ना आते है
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भादों के महीने में पूजा होती कदम्ब की
धार्मिक लोग भारत के सबके कल्याण हेतु
कदम्ब की टहनी को
आंगन मे लगवा के इसकी पूजा कराते हैं

Saturday, May 30, 2009

garmee ke din


पत्तो से पेड़ों के
आती छनकर किरणें
आग सी बरसती है.
मानव की बात दूर
पौधे कुम्हलाते हैं.

चलती है गरम हवा
लू लगने के डर से
घर में छिप जाते हैं.
धूप से पराजित हो
तड़प तड़प जाते हैं.

रुकने की आस लिए
बढते जाते पथिक
छाँव कहीं आगे है
जलते हैं पैर भले
चलते ही जाते हैं.

नीम तले खटिया पर
सोने सी दोपहरी
लेटकर बिताते हैं
चांदी सी रातों में
थककर सो जाते हैं