Saturday, May 30, 2009

garmee ke din


पत्तो से पेड़ों के
आती छनकर किरणें
आग सी बरसती है.
मानव की बात दूर
पौधे कुम्हलाते हैं.

चलती है गरम हवा
लू लगने के डर से
घर में छिप जाते हैं.
धूप से पराजित हो
तड़प तड़प जाते हैं.

रुकने की आस लिए
बढते जाते पथिक
छाँव कहीं आगे है
जलते हैं पैर भले
चलते ही जाते हैं.

नीम तले खटिया पर
सोने सी दोपहरी
लेटकर बिताते हैं
चांदी सी रातों में
थककर सो जाते हैं

Friday, April 24, 2009

क्रिकेट धर्मं है तो सचिन भगवान है


क्रिकेट धर्मं है तो सचिन भगवान है - सचिन के जन्मदिवस पर विशेष



आज २४ अप्रैल को जब क्रिकेट प्रेमी सचिन का ३७ वा जन्मदिवस मना रहे हैं तो एक शीर्षक पढ़ा कि अगर क्रिकेट धर्म है तो सचिन भगवान है। इंसान को भगवान बनाना क्यों जरूरी है? क्या लाखो भगवानो से हमारा मन नही भरा ? कभी हम अमिताभ को भगवान बनाते है कभी रजनी कान्त को और एक दिन किसी बात पे हमारा मोह भंग हो जाए तो हम अपने भगवान से इतने खफा हो जाते हैं कि उसके पुतले जलाएंगे उसका घर से वाहर निकलना मुश्किल कर देंगे। आओ हम सचिन को एक वेहतरीन इंसान और खिलाड़ी के रूप में देखें.

महानतम भारतीय क्रिकेटर माने जाने बाले सचिन रमेश तेंडुलकर का जन्म २४ अप्रैल , १९७३ को मुंबई में हुआ। विजडन ने उन्हें टेस्ट क्रिकेट का दूसरा सबसे अच्छा बल्लेवाज माना। वे एक दिवसीय क्रिकेट के सबसे सफल बल्लेवाज हैं। सचिन तेंदुलकर को लिटिल मास्टर भी कहा जता है।



सचिन एक दिवसीय और टेस्ट मैच दोनों में सबसे ज्यादा रन और शतक बनाने बाले खिलाड़ी हैं। विश्व कप में सचिन सबसे ज्यादा रन बनाने बाले खिलाड़ी हैं। सचिन तेंदुलकर को उनकी खेल प्रतिभा के लिए पद्म भूषन और राजीव गाँधी खेल रत्न पुरूस्कार से भी जिताभारत सरकार ने विभूषित किया। लेकिन उनका सबसे बड़ा पुरूस्कार क्रिकेट प्रेमियों का अनवरत प्यार है।



सचिन को क्रिकेट के मैदान में और मैदान के वाहर शानदार व्यबहार के लिए जाना जाता है। यह उन्हें अपने समकालीन क्रिकेट खिलाड़ियों से अलग पहचान दिलाती है।



आओ हम उन्हें उनके जन्म की ३६ वी वर्षगाँठ पर शुभकामना देते हैं और उनके और भी उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।

Monday, March 9, 2009

जिसका कोई ना पूछे हाल - उसके साथ गिरधारी लाल


स्वर्गीय गिरधारी लाल भार्गव
जन्म ११.११.१९३६ - देहावसान - ०८.०३.२००९
बार के पार्षद, ३ बार के विधायक और ६ बार सांसद
अगर कोई शहर स्वप्न देखे कि उसका जन प्रतिनिधि कैसा हो तो एक छवि उभरकर आती है और उसे नाम दिया जाता है गिरधारी लाल भार्गव। सच्चे जनसेवक, सामजिक कार्यकर्ता, सक्रिय पार्षद, जनप्रिय विधायक और बेहद लोकप्रिय सांसद गिरधारी लाल भार्गव अब स्मृति शेष हो गए हैं लेकिन अपने पीछे एक ऐसा जीवन इतिहास छोड़ गए हैं जो जयपुर शहर, राजस्थान और पूरे भारतवर्ष में एक अनूठी मिसाल बन गया है।
एक ऐसा व्यक्ति जो निरंतर राजनीतिक सफलताए पाता चला गया लेकिन उसकी मिलनसारिता और विनम्रता ज्यो कि त्यों बरकरार रही। चुनावों में जब उनके विरोधियो को उनके ख़िलाफ़ कहने को कुछ नही मिलता तो उनकी जो अप्रतिम विशेषता थी ( तीये की बैठको में भाग लेना, गरीबों की अस्थियों को स्वयं गंगाजी ले जाना, अधिक से अधिक सामाजिक कामो मैं भाग लेना और बिना जाती पाती की चिंता किए सबके साथ साम करना ) उसी का मखौल उडाया जता था।
मैंने ख़ुद देखा है उनका संस्कार जब वो कवि सम्मलेन सुनने जाते तो कभी मंच पर नही बैठे और अंत तक अग्रिम पंक्ति में बैठकर कवि सम्मलेन का आनंद उठाते। कितने राजनेता इतने सरल और सहज होते हैं। ६ बार सांसद चुने जाना उतना बड़ा कमल नही है जितना इस सरलता को सहेज कर रखना मुश्किल है।
अहमदाबाद में दिल का दौरा पड़ने से कल उनका निधन हो गया। भगवान से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे और परिवार को इस दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।



Monday, February 2, 2009

राजेंद्र यादव के कटुवचन - हिन्दी प्रेमी गुस्से में




हिंद युग्म के वार्षिक कार्यक्रम में ख्यातनाम साहित्यकार श्री राजेंद्र यादव के संवोधन से पैदा हुआ विवाद और उसमें वेहद गुस्से के तेवर से एक बात साफ़ हो जाती है कि हिंदी की ये नयी सेना हिंदी भाषा को समृद्ध करने के लिए कटिबद्ध है। आओ दोस्तों हम इसका जस्न मनाये. जो कुछ राजेंद्र यादव ने कहा उसे कहने के तरीके से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूँ लेकिन मेरा सहमत या असहमत होना राजेंद्र यादव के लिए इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना अपने चिर विवादस्पद लहजे में अपनी बात कहना. ये ठीक है अब हिंदी के साहित्यकारों को नए जमाने के हिसाब से नए सृजन मूल्य तलाशने होंगे. और अपने अतीत से वाहर निकलना होगा. ये उनकी सोच है जिससे आप सहमत हो सकते हैं और असहमत भी. भाषा ने अपनी यात्रा में बहुत विकास किया है और ये ही भाषा की समृद्धी है. लेकिन उनकी इस बात से सहमत होने का कोई कारण नहीं नज़र आता कि उन्हें कूडेदान मे फेंक दो. वो बेकार है. तो ये जो हिकारत का भाव है अपनी भाषा के प्रति ये सठियाने या अपार दंभ का परिचायक है. आप अपनी बात कहें. लेकिन अपनी विरासत को लात मत मारिये. ये भी कि इस सारी आलोचना से राजेंद्र यादव पर कोई फर्क नहीं पड़ने बाला. वो आदमी नए नए विवादों की खोज करता है और इसी से उसकी दूकान चलती है. शोभा जी का आक्रोश बिल्कुल उचित है लेकिन हम एक बात और समझें कि किसी विद्वान् को हम आमंत्रण दें तो उसके विचार पर मनन करें. अच्छा लगे उसे काम में लें, अच्छा ना लगे भुला दें लेकिन ये उम्मीद करना कि उसका भाषण वैसा होगा जो हमारे विचार हैं ये संभव नहीं है और ऐसा होना भी नहीं चाहिए.जहां तक प्रश्न सबके सामने सिगार पीने का है इसका साफ़ मतलब है कि वो समाज के नियमो को नहीं मानता, अब ऐसे असामाजिक व्यक्ति को मुख्या अथिती बनाना चाहिए या नहीं हमें सोचना है.

Saturday, January 31, 2009

सुभिक्षा - दिवालियापन के कगार पर

भारतीय शहरों मे खुदरा खरीद का एक प्रतिष्ठित खिलाड़ी सुभिक्षा नकदी की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। ११ साल मे सुभिक्षा ने देश भर मे १६०० स्टोर खोले। अब हालत ये है की प्रवंधन के पास ना तो वेतन चुकाने को पैसा है न ही बिल चुकाने को। ऐसी हालत मे ३०० करोड़ की नगदी की ज़रूरत बताकर प्रवंधन अपनी बेबकूफीयों के लिए पुरूस्कार मांग रहा है। निदेशक सुब्रह्मण्यम जी का ये कहना - हम व्यंसाय के लिए प्रतिबद्ध हैं और भागेंगे नही कोई मतलब नही रखता है। मेरे पिछले लेख http://nukkadh.blogspot.com/2009/01/blog-post_28.html का आशय यही था की अभी पता नही कितने राजू हमें बेबकूफ बना रहे हैं।




Saturday, January 24, 2009

सत्यम शिवम् सुन्दरम - राजू गंदा अच्छे हैं हम

राजू का ताश के पत्तो का साम्राज्य ढह रहा है और बाकी सभी खिलाड़ी अपने मन में खुश हो रहे हैं कि माना तो उसी ने है - सो चोर भी केवल बही सावित हुआ. हम उन आँख के अंधे निदेशक बोर्ड के सदस्यों को क्या कहेंगी जिन्होंने कभी बैलेंस शीट पढने की जेहमत नहीं की. कौन मानेगा इस बात को. पब्लिक लिमिटेड कंपनी हर ३ माह मे अपनी बैलेंस शीट अखवार मे छपती है. और उस पर चर्चा होती है. लेकिन उन सबको लगा जैसे कि राजू भैया के पास कोई जादू है जो वो लाभ तेजी से बढा रहे है और शेयर की कीमत भी उस जादू से उपर जा रही है. तो उस लोभी निदेशक मंडल को राजू ने क्यों अपने बयान मे तमाम जिम्मेदारी से मुक्त किया इसकी जांच होनी चाहिए. कंपनी के औडिटर तो शक के घेरे मे नहीं पूरी तरह दोषी है ही उन बैंको के बारे मे क्या जिन्होंने गलत प्रमाण-पत्र दिए. म्यूचुअल फंड के रिसर्च विभाग मे क्या हो रहा था? क्या उन्हें उद्योग की प्रगति पर शक नहीं करना चाहिए था ? और अब क्या अकेली सत्यम मे गड़बड़ है शायद समंदर के पाने मे ही कुछ गड़बड़ है. समूचे वाणिज्य जगत को इस पर पारदर्शक मंथन करना पडेगा.

Thursday, January 22, 2009

'Slumdog Millionaire'

स्लम डॉग मिलियोनर - झुग्गी का कुत्ता - १० लाख बाला
क्या भावना है साहब और क्या अंदाज़ है बात को कहने का और हम खुश है, इस बदतमीजी को पुरूस्कार मिलने की संभावना है। मेरा कुत्तो से कोई झगडा नही है और हाँ इस बात मलाल है कि हम कुत्तों की तरह अपने होने के चरित्र से दूर क्यों जा रहे है। मेरा प्रश्न ये है कि कैसे कोई इंसान दूसरे इंसान को कुत्ता कह देता है। और ये अंडर-डॉग की तरह एक मोहावरा नहीं है गाली है हिकारत है संवेदना रहित शाब्दिक दिवालियापन है ।

ऐसी बातो पर नस्ल भेद का हल्ला करने बाला सभ्य समाज क्यों नहीं इसे नस्ल भेदी टाइटल नही मानता ? हरभजन पर मंकी कहने का आरोप लगाया गया था जो सच नही था लेकिन जो सच ही उसने कहा था वो बहुत शर्मनाक था। गरीबों को इससे पहले कभी कुत्ता नही कहा गया। दोष इसमे दूसरो का नही हमारे अपनों का है जो नामी पुरुस्कारों के लिए इंसानियत की आत्मा का सौदा करते हैं।

मुझे अच्छा लगेगा यदि इसे सही भाषा समझने बाले लोग ख़ुद को फ्लैट-डॉग, कोठी-डॉग, क्वार्टर-डॉग, सिने-डॉग, पॉलिटिकल-डॉग, राईटर-डॉग, बाबू-डॉग, ऑफिसर-डॉगऔर इस जैसेविशेषणों से विभूषित करें।
वैसे कल को जीवोक्रेसी की अदालत में कुत्ते आपत्ति कर सकते हैं कि क्यूँ इन तमाम निकम्मे लोगो के नाम के साथ हमारा नाम लगाकर हमारा अपमान किया जा रहा है?
आपका अपना
हरी-डॉग