Thursday, February 11, 2010

फिलाडेल्फिया (अमेरिकी राज्य पेंसिल्वेनिया ) मे वर्फ़ का नज़ारा




श्री सन्जीव सोफ़्टवेयर  इन्जीनियर  -  फिलाडेल्फिया (अमेरिकी राज्य  पेंसिल्वेनिया )
फिलाडेल्फिया नाम का शहर है 
वहा रहते है बहुत पुराने दोस्त 
कहने को अभासी पर लौकिक ही है 
कई साल से बसे हुए है वहा 
सन्जीव अपने परिवार के साथ 
आज जब उनसे हुई बात 
पूछा हमने कैसे है हालचाल 
हटा रहा हू वर्फ़ के पहाड 
जमी है २ -२ फ़ीट वर्ग 
गाल बेहाल है यहा हमारा 
आप पूछते हो क्या हाल है   

वर्फ़  की जब बात सुनी तो 
जिग्यासा मन मे उठी 
 कैसी दिखती होही  वर्फ़
कैसा वातावरन होगा
क्या मनोरम छटा होगी 
तनिक हमको दिखा तो दो  


कहने लगे शर्मा जी 
जिधर भी नजर डालो 
वर्फ़ की ही माया है 
वर्फ़ का ही साया है 
वर्फ़ मे कोई सडक पे 
निकल नही पाया है 
हमने तब उनसे पूछा
क्या वहा हमेशा ही 
ऐसा  ही मौसम है 
ऐसे ही वर्फ़ का 
चारो दिशाओ मे 
खुला खेल होता है  


इस पर वो कहते है 
आखिरी के महीनो मे 
हर साल  ऐसे ही 
देखने मे आया है 
यहा का मौसम तो 
वर्फ़ीला ही होता है 

लेकिन इस बार तो 
६० साल के बाद 
इतनी वर्फ़ पडी है 
सूरज के दर्शन नही 
मौसम तो अच्छा है 
पर परेशानी बडी 
(चित्र गूगल से साभार  ) 

Tuesday, February 9, 2010

आज कुमार विश्वास जयन्ती है - जन्म १०.०२.१९७०

वास

डाँ कुमार विश्वास
जन्मदिन  - बसंत पंचमी

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है 
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है

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१० फरवरी (बसंत-पंचमी ) को पिलखुवा (गाज़ियाबाद) में जन्में डाँ कुमार विश्वास का नाम हिन्दी कविता-प्रेमियों के लिए परिचय का मोहताज नहीं है। कवि-सम्मेलन के मंचों पर उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी वाक्-पटुता, विद्वता, और समय-अवसर पर अपनी विराट स्मरण-शक्ति का प्रयोग है। श्रोताओं को अपने जादुई सम्मोहन में लेने का उनका अदभुत कौशल, उन्हें समकालीन हिन्दी कवि-सम्मेलनों का सबसे दुलारा कवि बनाता है। आई.आई.टी , आई.आई.एम या कॉरपरेट-जगत के अधिक सचेत श्रोता हों, या कोटा-मेले के बेतरतीब फैले दो लाख के जन समूह का विस्तार हो , प्रत्येक मंच को अपने संचालन में डॉ कुमार विश्वास इस तरह लयबद्ध कर देते हैं कि पूरा समारोह अपनी संपूर्णता को जीने लगता है। स्व० धर्मवीर भारती ने उन्हें हिन्दी की युवतम पीढ़ी का सर्वाधिक संभावनाशील गीतकार कहा था। महाकवि नीरज जी उनके संचालन को निशा नियामक कहते हैं। तो प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा के अनुसार वे इस पीढ़ी के एकमात्र ISO 2006 कवि हैं। हास्यरसावतार लालू यादव, अभिनेता राजबब्बर, गोविन्दा, खिलाड़ी राहुल द्रविड़, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, नीतिश कुमार, टेली न्यूज के  चेहरो, उद्योगपतियों से लेकर भोपाल स्टेशन के कुलियों और मंदसौर मध्यप्रदेश की अनाज मंडी के पल्लेदारों तक फैला उनका प्रशंसक परिवार ही डॉ कुमार विश्वास की सचेत प्रज्ञा का परिचायक है। यह समूह डॉ कुमार विश्वास के देश दुनियां में फैले उन लाखों दीवानों का है जिन्हें उन्होंने बार-बार अपनी क्षमताओं से सम्मोहित किया है और जिनके दिलों की दास्तां को अपनी मीठी-आवाज , खास-अदायगी और खूबसूरत-लफ़्जों में बयान किया है
http://www.kumarvishwas.com/  से साभार 
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आज १० फरबरी है और इसे मैं कुमार विश्वास जयन्ती के रूप में याद करता हूँ. डा. कुमार विश्वास जिन्हें मैं इसलिए बहुत पसंद करता हू कि उन्होंने हिन्दी कवि सम्मलेन के मंचो से विदा होते हुए गीतों को नया जीवन दिया. एक समय आ गया था कि गीतकारो को कोई सुनना ही नहीं चाहता था और बड़े नामी गीतकारो को भी केवल नाम के लिए ही बुलाया जाता था. उस समय डा कुमार एक नयी हवा के झोंके की तरह आये तो आते ही छा गए.

१९९६ में कुमार का पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ जिसके एक हस्ताक्षरित प्रति मेरे पास अभी भी है. उससे कुछ माह पहले ही उनसे ठीक से परिचय हुआ था. मेरी कुछ खराब आदतों में से ये भी है कि मैं पंक्ति, मुक्तक या गीत नहीं याद करता बल्कि किताब याद कर  लेता हू और १ महीने में ही मुझे डा. कुमार पूरी तरह से याद हो गए. कवि सम्मेलनों में कुमार से मुलाक़ात होती रहती.

२००० की गीत चांदनी में कुमार जयपुर  आये तो गीत को समर्पित इस अनोखे आयोजन में आगे से पीछे तक कुमार की धूम मची  हुई थी. पहले दौर में ही कुमार ने सभी श्रोताओं का दिल जीत लिया. दूसरे दौर में जब कुमार से एक के बाद दूसरे गीत की मांग होने लगी तो कुमार ने एक ऐसा गीत जो वो कभी भी मंच से नहीं सुनाते थे वो शुरू किया (रूपा रानी बड़े सयानी, मधुरिम वचना भोली- भाली ) तो सुनाते सुनाते कुमार अटक गए, एक दो बार कोशिश की लेकिन फिर उनकी नज़र मेरे ऊपर पडी और मंच से ही बोले शर्मा जी बताना भाई आगे क्या है. मै खडा हुआ और आगे की  पंक्तिया शुरू कर दी. इस तरह वो गीत पूरा हुआ. एक दम से मंच और सभी बचे हुए श्रोताओं में हंगामा हो गया. कवि सम्मेलनों के इतिहास में ये पहला मौक़ा होगा जब एक जाना माना कवि सामने बैठे श्रोता से कहे की आगे क्या है बताना. संचालक ने कहा शर्मा जी आप मंच पर आये और जो कुछ सुनना चाहे सबको सुनाये. लेकिन मैंने मना कर दिया. मैंने कहा श्रोता के रूप मे में नंबर १ हूँ कवि के रूप में आख़िरी पायदान पर नहीं बैठूंगा. जिस दिन मेरी कविता में दम होगा मै खुद मंच पे आ जाउंगा. उन्होंने कहा आप इतना तो करो ही  कि  अपने विजिटिंग कार्ड सारे कवियों को दे दो क्या पता कब किसे जरूरत पड़ जाये. वाद में प्रसिद्द कवयित्री श्रीमती सरिता शर्मा जी ने कहा शर्मा जी आप जैसा एक भी श्रोता मिल जाए तो हम लोगो का जीवन सफल हो जाए.

इसके बाद अनेक जगह अनेक अवसरों पर डा कुमार को सुनते और मिलते रहे कभी अलीगढ़ कभी गाज़ियाबाद कभी एटा इस बीच मेरा निवास आगरा बना. तभी देखा कि डा कुमार इन्टरनेट पर लोकप्रिय हो गए है उन्हें ऑरकुट पर जोड़ा और जी टॉक और याहू पर भी और बात होने लगी. तभी हमारी आपसी बात चीत को पढके आगरा में उनके एक भगत  ने हमें ढूढ़ लिया तो हमने डा कुमार को फ़ोन मिला के  उनका परिचय भी कराया और कहा कि भाई इन बच्चो पर क्या जादू कर दिया है. तब तक (२००७ ) उनकी नयी किताब "कोई  दीवाना कहता है" भी प्रकाशित हो गई  थी उसमे कुछ नए मुक्तक और गीत भी पढ़ने को मिले. फिर हमारा ट्रांसफर जोधपुर हो गया तो २० नबम्बर २००८ को कुमार जोधपुर आये उन्हें किसी कार्यक्रम में आगे जाना था तो दिन भर उनसे मुलाक़ात हुई वो घर भी आये. तब घर वालो से उनका परिचय भी हुआ. मैं नोयडा के एक कार्यक्रम में उनके परिवार से मिल चुका था.

मेरे बच्चो के स्कूल में बच्चे डा कुमार की चर्चा करते है तो बेटा और बेटी कहते है वो तो मेरे पापा के दोस्त है तो लडके लडकिया इसे गप्प समझते है. वैसे मेरे बेटे ने ३ साल की उम्र में सबसे पहले जो कविता टाइप चीज याद की वो कुमार का ये मुक्तक था जिसे उन दिनों मे गुनगुनाता रहता था.

बहुत टूटा बहुत  बिखरा थपेड़े सह नहीं पाया, 
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया. 
अधूरा अनसुना ही रह गया यूं प्यार का किस्सा, 
कभी तुम सुन नहीं पाए कभी मैं कह नहीं पाया. 

डा. कुमार के  कुछ लोकप्रिय मुक्तक यहाँ लिखने से खुद को नहीं रोक पा रहा हू.

 बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तन चंदन
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन
*****************************
समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नही सकता


ये आँसू प्यार का मोती है इसको खो नही सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नही पाया वो तेरा हो नही सकता
******************************
मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है 
यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है
*********************************
भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा

 डा कुमार विश्वास को जन्म दिन की शुभकामनाये

Sunday, February 7, 2010

टिप्पणी बन गयी पोस्ट



एक ब्लोग कहानी में एक टिप्पी होती है , एक टिप्पा होता है

मेरे ब्लोग पर टिप्पणी देने बाले
बेनामी  ना देना नाम से देने बाले 

तुम यहा टिपियाओ या ना टिपियाओ ये हक है तुमको
मेरी बात  और है  मुझे तो टिपियाना है

भूले से टिप्प्णी कर बैठा 
नादान है बेचारा ब्लोगर ही तो है 
हर ब्लोगर से टिप्पणी हो जाती है 
भेजो ना लीगल नोटिस टिप्पणी ही तो है 

तेरी प्यारी प्यारी टिपणी पे 
किसी की नज़र ना लगे
टिपियाबद्दूर 

बसन्ती, गब्बर की पोस्ट पे टिप्पणी मत करना

  
ये तो हुई टिप्पणी के साथ मसखरी. अब बात अजय की बात की तो भैया हमारी टिप्प्णी उतनी ही गम्भीर होती है जितना गम्भीर होने का हम नाटक कर रहे होते है. और हरि भाई उर्फ़ सन्जीव  भैया को तो पैसे मिलते थे  गम्भीरता ओढने के हम तो मुफ़त मे अपनी शकल बिगाडे घूम रहे है. 

हमने टिप्पणी मे कहा कि लडकी अगर बेरुखी दिखाये तो ये नही समझना चाहिये कि उसे आप पसन्द नही है. हम अपनी इस बात पे कायम है. अगर आपकी प्रीति सच्ची है और बेरुखी दिखती है तो प्रेमी को उसके अनुकूल होने के लिये और प्रयास करने चाहिये.

शिशु पाल सिह निर्धन ने कहा  -  

जब तक प्रतिबिम्ब लगे मैला
दर्पन को रख अपने आगे
पूजा का दीपक बनकर जल
जब तक ना मौन प्रतिमा त्यागे

इसी बात को कुवर बेचैन कहते है  - 

दीवारो पे दस्तक देते रहना है
दीवारो मे दरवाजे बन जायेन्गे

बात ग्लोबल वार्मिन्ग की उसके लिये तो दुनिया भर के लोग चिन्तित है. लेकिन हम ग्लोबल ब्लोगिन्ग के लिये निकले थे लेकिन ब्लोग  जगत मे ब्लोगर वार्मिन्ग तक पहुच गये है. कुछ इसकी भी तो चिन्ता करो मेरे भाई.
हरि शर्मा
9680890951

मेरा दूसरा ब्लोग
http://sharatkenaareecharitra.blogspot.com/

Sunday, January 31, 2010

चले जाना वेहद प्रतिभाशाली और सभ्य राजनेता का - राम निवास मिर्धा

२९ जनवरी २०१० को राजस्थान ने एक वेहद सभ्य और बहुमुखी प्रतिभाशाली राजनेता राम निवास मिर्धा को  खो दिया. ८६ बर्ष की आयु में दिल्ली के गंगा राम अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. अभी वे संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष थे. उनका जन्म राजस्थान के बाड़मेर जिले के जसोल कस्वे में   २४ अगस्त १९२४ को  हुआ और इनका परिवार नागौर जिले के कुचेरा के पास राड कस्वे से सम्बंधित है.  उनके पिता स्वर्गीय बलदेव राज मिर्धा तत्कालीन जोधपुर राज्य की पुलिस सेवा में अधिकारी थे.  


उन्होंने एम ए, एल एल बी की शिक्षा भारत  के इलाहाबाद विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय से और जेनेवा के ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ़  इंटरनॅशनल स्टडीज से प्राप्त की. शिक्षा समाप्ति के बाद कुछ समय तक आपने राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के रूप  में सेवा की और फिर राजनीति  में कूद पड़े. १९५३ में राजस्थान विधान सभा में प्रवेश किया. १९५४ से १९५७  तक आप राजस्थान सरकार में मंत्री रहे  और १९५७ में उन्हें उनकी योग्यता और प्रतिभा को देखते हुए राजस्थान विधान सभा का अध्यक्ष चुना गया,  इस पद पर आपने १९६७ तक काम किया. १९६७ से १९84 तक श्री मिर्धा  राज्य सभा के सदस्य रहे. और १९८४ से १९८९ तक नागौर से और १९९१ से १९९६ तक बाड़मेर से लोकसभा के सदस्य रहे. 


केंद्र की राजनीति में उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारिया बड़ी कुशलता से निभाई. जिनका विवरण इस प्रकार है -


केन्द्रीय राज्य मंत्री - गृह मंत्रालय, कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग (जून 1970-1,974 अक्टूबर) 
केन्द्रीय राज्य मंत्री - रक्षा उत्पादन (अक्टूबर 1974-1975 दिसम्बर, केन्द्रीय राज्य मंत्री - आपूर्ति एवं पुनर्वास (स्वतंत्र प्रभार) (दिसंबर 1975-1977 मार्च)
उपाध्यक्ष, राज्य सभा (1977-1980)
जल संसाधन विभाग के मंत्री (1983 जनवरी 1984 अगस्त)
विदेश (August 1,984-1984 दिसम्बर) मामलों के मंत्री
संचार (1985-1986 अक्टूबर) जनवरी के मंत्री
कपड़ा मंत्री (कैबिनेट रैंक), स्वास्थ्य और परिवार कल्याण का अतिरिक्त प्रभार (अक्टूबर 1986-1989 दिसम्बर),
सदस्य दसवें बाड़मेर से लोक सभा, (1991-1996) राजस्थान, संयुक्त संसदीय समिति  1992  के अध्यक्ष प्रतिभूति और बैंकिंग में अनियमितताओं की जांच के लिए. . 


राम निवास मिर्धा ने अनेक मौको पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जिताभारत का प्रतिनिधित्व: किया.जैसे -
संयुक्त राष्ट्र संघ , राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलनराष्ट्रमंडल पीठासीन अधिकारियों का सम्मलेनअंतर संसदीय संघ का  सम्मेलनभारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता संयुक्त राष्ट्र, महासभा, 1984 से सितम्बरसदस्य कार्यकारी 1993-1997 (यूनेस्को के बोर्ड).
वह बहुत से सांस्कृतिक  मामलों में सक्रिय रहे हैं. राष्ट्रीय खेल संस्थान, दिल्ली शहरी कला आयोग के उपाध्यक्ष विशेष आयोजन ग्यारहवीं एशियाई खेलों के लिए समिति, और राष्ट्रपति, यूथ हॉस्टल एसोसिएशन ऑफ इंडिया.
राष्ट्रपति, भारतीय विरासत सोसाइटी
वरिष्ठ उपाध्यक्ष, संवैधानिक और संसदीय अध्ययन संस्थान. 
मानद. राष्ट्रपति विश्व यू एन संघों पर संघ
अध्यक्ष, भारतीय यू एन एसोसिएशन के संघ
अध्यक्ष भारतीय इंटरनेशनल लॉ सोसायटी
अध्यक्ष, संगीत नाटक अकादमी (राष्ट्रीय संगीत, नृत्य तथा नाटक अकादमी)
अध्यक्ष,  सूरजमल  मेमोरियल एजुकेशन सोसायटी, नई दिल्ली.

इस पोस्ट के माध्यम से हम उन्हे अपनी भावभीनी श्रद्धान्जली अर्पित करते है

Sunday, January 17, 2010

स्मृति शेष रांगेय राघव - जन्म तिथि १७ जनवरी




जन्म तिथि १७.०१.१९२३

निधन १२.०९.१९६२
 आज जिनका जन्म दिवस है
प्रतिभाशाली लोगो का जीवन बहुत छोटा होता है लेकिन वो इस अल्प समय मे इतना कुछ कर जाते है कि उन्हे सदियो तक याद किया जाता है.  ऐसी ही एक प्रतिभा का नाम रांगेय राघव है. १७ जनबरी,  १९२३ को आगरा मे जन्मे रांगेय राघव ने सेन्ट जोन्स कालेज आगरा से परा- स्नातक हिन्दी मे करने के बाद गुरु गोरखनाथ पर शोध किया और अपने लिये साहित्य के डाक्टर की उपाधि हासिल की. उनका पूरा नाम तिरूमल्ली नम्बकम वीर राघव आचार्य था. उन्हे अंग्रेज़ी, हिन्दी, संस्कृत और उस बृज भाषा पर पूर्ण अधिकार था. हम जब छोटे थे तब पढे लिखे लोग उनकी चर्चा एक किवदन्ती पुरुष की तरह करते थे. मेरे पिता और उनके  साथी इस बात पर बहुत फ़क्र करते थे कि उन्होने अपनी जिन्दगी मे एक महान लेखक को देखा है और मुझे ये सौभाग्य मिला कि उनकी अर्धान्गिनी श्रीमती सुलोचना राघव और उनकी पुत्री से बाद मे मिला.   


सिर्फ़ १३ साल की उमर मे उन्होने लेखन शुरु कर दिया था और सबसे पहले साहित्य जगत मे उनकी चर्चा बन्गाल के अकाल पर उनकी रिपोर्ट से हुई  तब उनके उमर १९ साल थी. उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी जिसमे चित्रकला, सन्गीत, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, सन्स्मरण लेखन, आलोचना  और अनुवाद शामिल है. और इस विविधता ने लेखक के रूप मे उनकी प्रतिभा को नये आयाम और विशिष्टता प्रदान की. लम्बी बीमारी से झूझते हुए ३९ बर्ष की बहुत ही अल्प आयु मे १२ सितम्बर १९६२ को निधन से पहले उन्होने करीब १५० किताबे लिखी.


अपनी सृजन-यात्रा के बारे में रांगेय राघव ने स्वयं कोई खास ब्योरा नहीं छोड़ा है—खास कर अपने प्रारंभिक रचनाकाल के बारे में। लेकिन एक जगह उन्होंने लिखा है, ‘‘...चित्रकला का अभ्यास कुछ छूट गया था। 1938 ई॰ की बात है, तब ही मैंने कविता लिखना शुरू किया। सांध्या-भ्रमण का व्यसन था। एक दिन रंगीन आकाश को देखकर कुछ लिखा था-वह सब खो गया है—और तब से संकोच से मन ने स्वीकार किया कि मैं कविता कर सकता हूँ। ‘प्रेरणा कैसे हुई’ पृष्ठ लिखना अत्यंत दुरुह है। इतना ही कह सकता हूं कि चित्रों से ही कविता प्रारंभ हुई थी और एक प्रकार की बेचैनी उसके मूल में थी’’ (साहित्य संदेश, जनवरी-फरवरी, 1954)।

कहानी लिखना वे इससे पहले शुरू कर चुके थे—1936 से, जब वे सिर्फ तेरह वर्ष के थे। हालाँकि उनकी उस उम्र की कहानियों और दूसरी रचनाओं के संबंध में निश्चयपूर्वक कुछ भी कहना मुश्किल है। मुमकिन है, उनमें से कुछ बाद के वर्षों में नष्ट कर दी गई हों, क्योंकि उनके मित्र परिजनों के मुताबिक न जँचने पर वे अपनी रचनाओं के साथ यही सलूक करते थे। फिर भी इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ रचनाएँ बाद में दोबारा लिखी या दुरुस्त न की गईं या बतौर लेखक स्थापित होने के बाद दस्तावेजीकरण की दृष्टि से छपाई न गई होगीं। मसलन अंधेरे की भूख और बोलते खँडहर जो क्रमशः 1954-55 में प्रकाश में आई, जिन पर लेखक ने किशोरावस्था में पढ़े रोमांचक विदेशी उपन्यासों का स्पष्ट प्रभाव स्वीकार किया है।



रांगेय राघव को जो पुरुस्कार मिले उनमे प्रमुख रहे - १. हिन्दुस्तान अकेदेमी अवार्ड ( १९४७ ), २. डाल्मिया अवार्ड ( १९५४ ), ३. उत्तर प्रदेश सरकार अवार्ड {१९५७, १९५९), ४. राजस्थान साहित्या अकादमी अवार्ड ( १९६१ ), ५. महात्मा गान्धी अवार्ड ( १९६६ ) - निधन के बाद.

अपनी प्रसिद्ध पुस्तक पुस्तक प्राचीन ब्राह्मन कहानिया की प्रस्तावना मे वो लिखते है कि "आर्य परम्पराए अनेक अनार्य परम्परओ से मिलन हुआ है. भारत की पुरातन कहानियो मे हमे अनेक परम्परओ के प्रभाव  मिलते है. महाभारत के युद्ध के बाद हिन्दू धर्म मे वैष्नव और शिब चिन्तन की धारा वही और इन दोनो सम्प्रदयो ने पुरातन ब्राहमन परम्पराओ को अपनी अपनी तरह स्वीकार किया..इसी कारण से वेद और उपनिषद मे वर्णित पौराणिक चरित्रो के बर्णन मे वदलाव देखने को मिलता है. और बद के लेखन मे हमे अधिक मानवीय भावो की छाया देखने को मिलती है. मै ये महसूस करता हू कि मेरे से पहले के लेखको ने अपने विश्वास और धारणाओ के आलोक मे मुख्य पात्रो का बर्णन  किया है और ऊन्चे मानवीय आदर्श खडे किये है और अपने पात्रो को साम्प्रदायिकता से बचाये रखा है इसलिये मैने पुरतान भारतीय चिन्तन को पाठको तक पहुचाने का प्रयास किया है."


उनकी लिखी प्रमुख पुस्तको के नाम है. - 
घरौन्दा 
कब तक पुकारू
रत्ना की बात 
भारती का सपूत 
देवकी का बेटा
लूई का ताना
यशोधरा जीत गई 
आखरी आवाज़
पथ का पाप
लखिमा की आखे 
उनके बारे मे कहा जाता था कि वो दोनो हाथो से रात दिन लिखते थे और उनके लिखे ढेर को देखकर समकालीन ये भी कयास लगाते थे कि शयद वो तन्त्र सिद्ध है नही तो इतने कम समय मै कोइ भी इतना ज्यदा और इतना बढिया कैसे लिख  सकता है. उन्हे हिन्दी  का पहला मसिजीवी कलमकार भी कहा जाता है जिनकी जीबिका का साधन सिर्फ़ लेखन था.