लोग तो परेशान हैं कि जब घर में घुसो देखो शयनकक्ष से लेकर के बाहर की बैठक तक यहाँ वहां सब जगह सामान बिखरा पडा है _______________ रातों में नभ निहारो निशा की रियासत में सैनिक बन दमक रहे तारे हैं टिमटिमा रहे राजा से चन्द्रमा का प्रकाश बिखरा पडा है _______________ दुनिया में घृणा देख व्याकुल हुआ कवि मन युद्ध की तो कौन कहे घरेलू मसलों पर ही इंसानियत मर रही है खून बिखरा पडा है _______________ जीवन भी देखो ना माटी के पुतले में साँसों का डेरा है आस का पखेरू है उसमें भी सपन मेरा टूटा बिखरा पडा है _______________ हरि शर्मा |
Friday, September 4, 2009
सब जगह बिखरा पडा है
Sunday, August 30, 2009
मंदी
कुछ और रोजगार छूटे
कुछ और घरों की नीलामी हुई
बस इतनी सी बात हुई और
मेरे देश में दिन की शुरुआत हुई
मंदी का ये दुर्योधन मानो
द्रौपदी सी अर्थव्यवस्था की
इज्ज़त हरने को आतुर है
और ओबामा बने कृष्ण
संकट में हैं कहाँ से लायेंगे
इतना बेल-आउट का चीर
आर्थिक मंदी ने झकझोरा सबको
किसी को ज्यादा किसी को कम
कुछ तो झटका झेल गए
तो कुछ ने लगाया अपने
मंदी से घबराकर अपने
जीवन पर पूर्ण विराम
आशा भी डूबती जाती है
आख़िर कब लेगी
यह तंगी थोड़ा विश्राम
किस दिन उगेगा वो सूरज
जिसकी किरणे करेंगी
इस दानव का काम तमाम
कहतें है समय बड़ा बलवान
और है हर मर्ज की दवा
दो गोली संतुष्टि की
सुबह शाम खाओ और
सुनो हमारा भी नुस्खा
बुरा वक्त तो निकल जाएगा
पर तुम धीरज न खोना
नौकरी जाए या फिर
व्यापर क्यो ना डूबे पर
आस का साथ न छोडना
कभी तो होगा ही भइया
इस काली रात का अवसान
( शैलेश मंगल )
कुछ और घरों की नीलामी हुई
बस इतनी सी बात हुई और
मेरे देश में दिन की शुरुआत हुई
मंदी का ये दुर्योधन मानो
द्रौपदी सी अर्थव्यवस्था की
इज्ज़त हरने को आतुर है
और ओबामा बने कृष्ण
संकट में हैं कहाँ से लायेंगे
इतना बेल-आउट का चीर
आर्थिक मंदी ने झकझोरा सबको
किसी को ज्यादा किसी को कम
कुछ तो झटका झेल गए
तो कुछ ने लगाया अपने
मंदी से घबराकर अपने
जीवन पर पूर्ण विराम
आशा भी डूबती जाती है
आख़िर कब लेगी
यह तंगी थोड़ा विश्राम
किस दिन उगेगा वो सूरज
जिसकी किरणे करेंगी
इस दानव का काम तमाम
कहतें है समय बड़ा बलवान
और है हर मर्ज की दवा
दो गोली संतुष्टि की
सुबह शाम खाओ और
सुनो हमारा भी नुस्खा
बुरा वक्त तो निकल जाएगा
पर तुम धीरज न खोना
नौकरी जाए या फिर
व्यापर क्यो ना डूबे पर
आस का साथ न छोडना
कभी तो होगा ही भइया
इस काली रात का अवसान
( शैलेश मंगल )
Tuesday, July 7, 2009
कदम्ब का पेड़
श्याम की बन्शी से झुक गयी थी डाली
श्याम फूल चुन करके
राधा का जूडा सजा मन्द मन्द मुस्काते थे
*****
रसखान बोले कि मानव जनम मिले
कदम्ब के पेड हो, कालिन्दी बह्ती हो
ऐसी जगह जन्मू
यशोदा के लाल जहा राधिका को नचाते है
*****
महिमा भी जान लो कदम्ब के पेडन की
फूलो से इत्र बने पत्ती को कूटने पर
दवाओं के सेवन से
डाईबिटीज जैसे भी रोग नष्ट हो जाते है
*****
लम्बे और फ़ैले से, अति सुन्दर पेड हॊतॆ
मनभावन फूल जिसके, जड से पत्ती तक
फूल से टहनी तक
ऐसा ना कुछ भी जो काम ना आते है
*****
भादों के महीने में पूजा होती कदम्ब की
धार्मिक लोग भारत के सबके कल्याण हेतु
कदम्ब की टहनी को
आंगन मे लगवा के इसकी पूजा कराते हैं
Saturday, May 30, 2009
garmee ke din

पत्तो से पेड़ों के
आती छनकर किरणें
आग सी बरसती है.
मानव की बात दूर
पौधे कुम्हलाते हैं.
चलती है गरम हवा
लू लगने के डर से
घर में छिप जाते हैं.
धूप से पराजित हो
तड़प तड़प जाते हैं.
रुकने की आस लिए
बढते जाते पथिक
छाँव कहीं आगे है
जलते हैं पैर भले
चलते ही जाते हैं.
नीम तले खटिया पर
सोने सी दोपहरी
लेटकर बिताते हैं
चांदी सी रातों में
थककर सो जाते हैं
Friday, April 24, 2009
क्रिकेट धर्मं है तो सचिन भगवान है
क्रिकेट धर्मं है तो सचिन भगवान है - सचिन के जन्मदिवस पर विशेष
आज २४ अप्रैल को जब क्रिकेट प्रेमी सचिन का ३७ वा जन्मदिवस मना रहे हैं तो एक शीर्षक पढ़ा कि अगर क्रिकेट धर्म है तो सचिन भगवान है। इंसान को भगवान बनाना क्यों जरूरी है? क्या लाखो भगवानो से हमारा मन नही भरा ? कभी हम अमिताभ को भगवान बनाते है कभी रजनी कान्त को और एक दिन किसी बात पे हमारा मोह भंग हो जाए तो हम अपने भगवान से इतने खफा हो जाते हैं कि उसके पुतले जलाएंगे उसका घर से वाहर निकलना मुश्किल कर देंगे। आओ हम सचिन को एक वेहतरीन इंसान और खिलाड़ी के रूप में देखें.
महानतम भारतीय क्रिकेटर माने जाने बाले सचिन रमेश तेंडुलकर का जन्म २४ अप्रैल , १९७३ को मुंबई में हुआ। विजडन ने उन्हें टेस्ट क्रिकेट का दूसरा सबसे अच्छा बल्लेवाज माना। वे एक दिवसीय क्रिकेट के सबसे सफल बल्लेवाज हैं। सचिन तेंदुलकर को लिटिल मास्टर भी कहा जता है।
सचिन एक दिवसीय और टेस्ट मैच दोनों में सबसे ज्यादा रन और शतक बनाने बाले खिलाड़ी हैं। विश्व कप में सचिन सबसे ज्यादा रन बनाने बाले खिलाड़ी हैं। सचिन तेंदुलकर को उनकी खेल प्रतिभा के लिए पद्म भूषन और राजीव गाँधी खेल रत्न पुरूस्कार से भी जिताभारत सरकार ने विभूषित किया। लेकिन उनका सबसे बड़ा पुरूस्कार क्रिकेट प्रेमियों का अनवरत प्यार है।
सचिन को क्रिकेट के मैदान में और मैदान के वाहर शानदार व्यबहार के लिए जाना जाता है। यह उन्हें अपने समकालीन क्रिकेट खिलाड़ियों से अलग पहचान दिलाती है।
आओ हम उन्हें उनके जन्म की ३६ वी वर्षगाँठ पर शुभकामना देते हैं और उनके और भी उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।
Monday, March 9, 2009
जिसका कोई ना पूछे हाल - उसके साथ गिरधारी लाल
स्वर्गीय गिरधारी लाल भार्गव
जन्म ११.११.१९३६ - देहावसान - ०८.०३.२००९
२ बार के पार्षद, ३ बार के विधायक और ६ बार सांसद
अगर कोई शहर स्वप्न देखे कि उसका जन प्रतिनिधि कैसा हो तो एक छवि उभरकर आती है और उसे नाम दिया जाता है गिरधारी लाल भार्गव। सच्चे जनसेवक, सामजिक कार्यकर्ता, सक्रिय पार्षद, जनप्रिय विधायक और बेहद लोकप्रिय सांसद गिरधारी लाल भार्गव अब स्मृति शेष हो गए हैं लेकिन अपने पीछे एक ऐसा जीवन इतिहास छोड़ गए हैं जो जयपुर शहर, राजस्थान और पूरे भारतवर्ष में एक अनूठी मिसाल बन गया है।
एक ऐसा व्यक्ति जो निरंतर राजनीतिक सफलताए पाता चला गया लेकिन उसकी मिलनसारिता और विनम्रता ज्यो कि त्यों बरकरार रही। चुनावों में जब उनके विरोधियो को उनके ख़िलाफ़ कहने को कुछ नही मिलता तो उनकी जो अप्रतिम विशेषता थी ( तीये की बैठको में भाग लेना, गरीबों की अस्थियों को स्वयं गंगाजी ले जाना, अधिक से अधिक सामाजिक कामो मैं भाग लेना और बिना जाती पाती की चिंता किए सबके साथ साम करना ) उसी का मखौल उडाया जता था।
मैंने ख़ुद देखा है उनका संस्कार जब वो कवि सम्मलेन सुनने जाते तो कभी मंच पर नही बैठे और अंत तक अग्रिम पंक्ति में बैठकर कवि सम्मलेन का आनंद उठाते। कितने राजनेता इतने सरल और सहज होते हैं। ६ बार सांसद चुने जाना उतना बड़ा कमल नही है जितना इस सरलता को सहेज कर रखना मुश्किल है।
अहमदाबाद में दिल का दौरा पड़ने से कल उनका निधन हो गया। भगवान से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे और परिवार को इस दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।
Monday, February 2, 2009
राजेंद्र यादव के कटुवचन - हिन्दी प्रेमी गुस्से में

हिंद युग्म के वार्षिक कार्यक्रम में ख्यातनाम साहित्यकार श्री राजेंद्र यादव के संवोधन से पैदा हुआ विवाद और उसमें वेहद गुस्से के तेवर से एक बात साफ़ हो जाती है कि हिंदी की ये नयी सेना हिंदी भाषा को समृद्ध करने के लिए कटिबद्ध है। आओ दोस्तों हम इसका जस्न मनाये. जो कुछ राजेंद्र यादव ने कहा उसे कहने के तरीके से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूँ लेकिन मेरा सहमत या असहमत होना राजेंद्र यादव के लिए इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना अपने चिर विवादस्पद लहजे में अपनी बात कहना. ये ठीक है अब हिंदी के साहित्यकारों को नए जमाने के हिसाब से नए सृजन मूल्य तलाशने होंगे. और अपने अतीत से वाहर निकलना होगा. ये उनकी सोच है जिससे आप सहमत हो सकते हैं और असहमत भी. भाषा ने अपनी यात्रा में बहुत विकास किया है और ये ही भाषा की समृद्धी है. लेकिन उनकी इस बात से सहमत होने का कोई कारण नहीं नज़र आता कि उन्हें कूडेदान मे फेंक दो. वो बेकार है. तो ये जो हिकारत का भाव है अपनी भाषा के प्रति ये सठियाने या अपार दंभ का परिचायक है. आप अपनी बात कहें. लेकिन अपनी विरासत को लात मत मारिये. ये भी कि इस सारी आलोचना से राजेंद्र यादव पर कोई फर्क नहीं पड़ने बाला. वो आदमी नए नए विवादों की खोज करता है और इसी से उसकी दूकान चलती है. शोभा जी का आक्रोश बिल्कुल उचित है लेकिन हम एक बात और समझें कि किसी विद्वान् को हम आमंत्रण दें तो उसके विचार पर मनन करें. अच्छा लगे उसे काम में लें, अच्छा ना लगे भुला दें लेकिन ये उम्मीद करना कि उसका भाषण वैसा होगा जो हमारे विचार हैं ये संभव नहीं है और ऐसा होना भी नहीं चाहिए.जहां तक प्रश्न सबके सामने सिगार पीने का है इसका साफ़ मतलब है कि वो समाज के नियमो को नहीं मानता, अब ऐसे असामाजिक व्यक्ति को मुख्या अथिती बनाना चाहिए या नहीं हमें सोचना है.
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