Sunday, March 28, 2010

डा. कुमार विश्वास आज जोधपुर मे





आज हिन्दी कवि सम्मेलनो के सबसे चर्चित युवा गीतकार डा कुमार विश्वास जोधपुर मे है और शाम को ६ बजे एस एल बी एस कालेज मे उनका कार्यक्रम है. पहले मुलाकात हुई हवाई अड्डे पर फिर राजपूताना होटल के उनके कमरे मे. शाम को उनका कार्यक्रम है. मुलाकात का शेष भाग उसके पश्चात ब्लोग पर लिखेगे.  
उनके स्वागत मे उन्ही का एक नया गीत प्रस्तुत है. 


फिर बसंत आना है
डा. कुमार विश्वास




तूफ़ानी लहरें हों



अम्बर के पहरे हों


पुरवा के दामन पर दाग़ बहुत गहरे हों
सागर के माँझी मत मन को तू हारना
जीवन के क्रम में जो खोया है, पाना है
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है

राजवंश रूठे तो
राजमुकुट टूटे तो
सीतापति-राघव से राजमहल छूटे तो
आशा मत हार, पार सागर के एक बार
पत्थर में प्राण फूँक, सेतु फिर बनाना है
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है

घर भर चाहे छोड़े
सूरज भी मुँह मोड़े
विदुर रहे मौन, छिने राज्य, स्वर्णरथ, घोड़े
माँ का बस प्यार, सार गीता का साथ रहे
पंचतत्व सौ पर है भारी, बतलाना है
जीवन का राजसूय यज्ञ फिर कराना है
पतझर का मतलब है, फिर बसंत आना है


Tuesday, March 23, 2010

नक्सलवादी आंदोलन के संस्थापक कानू सान्याल नही रहे



आज के समाचर पत्रो की छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण  खबर है कि नक्सल आन्दोलन के जनक और सच कहे तो स्वतन्त्र भारत के सबसे सन्घर्षशील व्यक्तित्व कानू सान्याल नही रहे.उनका शव हाथीघीसा स्थित उनके घर में रस्सी से लटका हुआ पाया गया. पुलिस मान कर चल रही है कि पिछले कुछ समय से विभिन्न बीमारियों से परेशान कानू सान्याल ने आत्महत्या की है  यह सोचकर तो दिमाग का दिवाला निकल गया कि इस महा नायक ने आत्म हत्या की. मुझे यकीन नही होता.

अन्य साम्यवादी नेताओ की तरह कानू सान्याल बहुत पढे लिखे नही थे.  १९२९ मे जन्मे कानू ने मैट्रिक १९४६ मे किया और जब इन्टर्मीडियेट कर रहे थे तो पढाई छोड दी.  उसके बाद उन्हें दार्जीलिंग के ही कलिंगपोंग कोर्ट में राजस्व क्लर्क की नौकरी मिली. लेकिन कुछ ही दिनों बाद बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 

जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात चारु मजुमदार से हुई. जब कानू सान्याल जेल से बाहर आए तो उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली. 1964 में पार्टी टूटने के बाद उन्होंने माकपा के साथ रहना पसंद किया. 1967 में कानू सान्याल ने दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की. कानू सान्याल और चारु मजुमदार ने मिल कर बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन चलाया था, जिसके बाद वह आंदोलन पूरे देश में नक्सल आंदोलन के नाम से जाना गया.

24 मई 1967 को जिस आंदोलन की आग उन्होंने जलाई थी, वो आग आज भी उनके भीतर धधकती रहती थी. यही कारण है कि इस उम्र में भी वे गांव-गांव जाते थे, बैठक करते थे, सभाएं लेते थे. दार्जीलिंग के नक्सलबाड़ी से लगे हुए एक छोटे से गांव हाथीघिसा में अपने एक कमरे वाले मिट्टी के घर में रहने वाले कानू सान्याल की नज़र बस्तर से लेकर काठमांडू तक बनी रहती थी. हर खबर से बाखबर !

उनकी राय है कि भारत में जो सशस्त्र आंदोलन चल रहा है, उसमें जनता को गोलबंद करने की जरुरत है. अव्वल तो वे इसे सशस्त्र आंदोलन ही नहीं मानते. छत्तीसगढ़, झारखंड या आंध्र प्रदेश में सशस्त्र आंदोलन के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वे इसे “आतंकवाद” की संज्ञा देते हैं. वे नक्सलबाड़ी आंदोलन को भी माओवाद से जोड़े जाने के खिलाफ हैं. वे साफ कहते हैं- There is no existence of Maoism.

वो मानते थे कि जनता ही केवल देश की  शक्ति है. वो जनता अगर आपको साथ ना दे तो आप आगे नहीं बढ़ सकते हैं. और विशेषकर के मजदूर और उनका सबसे दृढ़ सहयोगी जो है किसान, उनकी संख्या भी सबसे ज्यादा है. वो अगर उनका साथ ना दे तो ये संग्राम टिक नहीं पाएगा. 

नक्सल्वादी आन्दोलन शुरू होने के दिनो को याद कर वो बताते थे कि अपने बडे नेताओ से वो जानना चाह्ते थे कि सत्ता मे आने पर वो जनता के लिये, मजदूरो के लिये, किसानो के लिये और गरीबो के लिये क्या क्या करेगे ये बताया जाये. उन्हे जबाब मिलता था - चुनाव तो जीतने दो आगे तब देखा जाएगा. भारत में उस समय 9 प्रांत में कांग्रेस खत्म हो गयी थी, यानि सत्ता से उखाड़कर फेंक दी गयी. लेकिन उन्हे अनुभव हुआ कि ना तो कांग्रेस, ना तो कम्यूनिस्ट पार्टी जो अपने आप को मजदूर किसान का हिमायती करती है. उनका कोई political will, (will) वो इस बात पर जोर देना चाहते थे,  कभी भी नहीं थी, आज भी नहीं है. 

फिर किसानो के बीच जाकर उन्होने कहा  - 
देखिए शांतिपूर्ण रूप से होगा नहीं हम लठ से, तीर धनुष से, बंदूक राइफल से लड़ नहीं सकते. तो naturally आपको तीर धनुष लेके शुरु करना होगा और बंदूक आपको अपने हाथ में लेना होगा. हम लोग ये बात सीखा करते थे कि हमारी बंदूक पुलिसों के हाथ में है, हमारी बंदूक मिलिटरी के हाथ में है. ये हमारे है, हमारे पैसा से है. पुलिस बजट में खर्चा होता है, मिलिटरी बजट में खर्चा होता है, ये हमारे पैसों का है, हम संगठित नहीं है. इसलिए बंदूक उनके हाथ में है. वो बंदूक हमारे हाथ में लेना है. अगर आप जमीन का रक्षा काहे कि अगर यहां कि भूमि व्यवस्था को आप पलटना चाहते हैं तो ये व्यवस्था का बात आ जाता है और जब व्यवस्था का बात आ जाता है तो वो चुपचाप बैठने वाला नहीं है. वो चुपचाप नहीं बैठेगा, वो आपके उपर दबाव बनाएगा.

पार्टी को जब छोड़ा तब के बारे मे कानू बताते है  - 1964 में सीपीएम ने थे. तो सीपीएम में, अंदर में revisionist leadership के विरोध में लड़ने लगे. एक तो दूसरी बार जेल गये. जब भारत-चीन युद्ध हुआ तो सरकार को ये डर था कि ये क्रान्तिकारी दल बन रहे है.   बंगाल में उन समेत ८ आदमी  की गिरफ्तारी हुई थी. प्रमोद दा भी उनके बीच गिरफ्तार हो गए थे और वे इस कारण से पार्टी कोन्ग्रेस मे भाग नही ले पाये थे. उस सम्मेलन के बाद उन लोगो को ये साफ़ हो गया था कि ये पार्टी (सी पी एम ) कुछ करने वाली नहीं है.


उसी समय सितंबर महीने में आनंदबाजार पत्रिका में एक खबर आयी कि चारु मजूमदार ने एक लेख लिखा है जिसमें सशस्त्र सन्घर्ष का आह्वान किया है. तो हम लोगों ने वो लेख पढ़ा जेल में तो हम उससे असहमत थे. फिर हम 66 में जेल से रिहा होकर आए और आने के बाद उनसे बातचीत हुई. हम लोग बोले - देखो हम आपके साथ सहमति रखते हैं कि सशस्त्र सन्घर्ष   करना है. लेकिन इसके लिए जनता तो आपके साथ में होना चाहिए. आप जनता को बताये कि यह जनहितकारी सुधारात्मक आन्दोलन है. प्राथमिक सन्गठन को आप छोड़ दीजिएगा तो आप जनता से कट जाइएगा. तो हम लोग बोला कि हम लोग एक साथ लड़ेंगे सुधारवाद के खिलाफ में. और हम लोग दो जगह चुनाव कर लें. आप अपने दस्ते को प्रयोग में लाएंगे. हम भी अपने जिला में दार्जिलिंग जिला में अमल में लाएंगे. किसी आदमी को षडयंत्रकारी कायदा से मारने से व्यवस्था खत्म नहीं होती. हां लड़ाई के मैदान में बोलिए व्यवस्था को मारने के लिए राइफल हाथ में लो, बंदूक जुगाड़ करो, बंदूक लूटो, ये अगर बोलें तो ये समझ में आता है. लेकिन क्या वास्ते बंदूक लूटेंगे, आपका कार्यक्रम होना चाहिए, मजदूर के लिए, किसान के लिए वो ही तो इस देश की संख्या है. वो ही लोग अगर इस संग्राम में नहीं रहेगा तो कैसे कर के हमारा संग्राम आगे बढ़ेगा.  नक्सलबाड़ी का संर्घष इसी का परिणाम है.








ये जो आंध्र में, छत्तीसगढ़ में, झारखंड में ये जो हथियारबंद आंदोलन चल रहे हैं उनके बारे मे कानू सान्याल कहते हैं कि ये आतन्कवादी हैं. वे मुख्य रूप से पैसे, बन्दूक और आतन्क पर निर्भर करते है. ये लोग आदमी को धमकी देकर पैसा देकर, पैसे वाले को अदा करते हैं कि कुछ कर रहे हैं. जनता को साथ लिये बिन ये लडाई सफ़ल नही होगी. 

अपने जीवन के लगभग 14 साल कानू सान्याल ने जेल में गुजारे. इन दिनों वे भाकपा माले के महासचिव के बतौर सक्रिय थे और नक्सलबाड़ी से लगे हुए हाथीघिसा गांव में रह रहे थे. दो साल पहले लकवाग्रस्त होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था. लेकिन इसके बाद उन्होंने कहीं भी भर्ती होने से इंकार कर दिया था.



डिस्क्लेमर : 

इस लेख के अधिकतर तथ्य http://www.raviwar.com पर आये लेख और रविवार पर ही प्रकाशित बातचीत से लिये गये है.

इस लेख का मकसद नक्सलवाद को बढावा देना नही है बल्कि नक्सल्वाद को समझने और कानू सान्याल के उस नक्सली चिन्तन के आदर्श को समझने का प्रयास किया है जिसके लिये वो जीवन के अन्त तक सन्घर्ष की राह पर चलते रहे और एक जीवन्त मिथक के रूप मे चर्चित् रहते हुए भी जिसने एक झोपडी मे अपना पूरा जीवन गुज़ार दिया.

हम हर तरह की हिन्सा की निन्दा करते है लेकिन कामना करते है कि समाज इतना समतावादी हो और देश मे इतना अमन चैन और खुशहाली हो कि देश मे किसी को भी इस राह पर चलने की इच्छा ही पैदा ना हो.

लघु सन्देश सेवा (SMS) से प्राप्त चुटकुले और सन्देश


मोबाइल पर प्रतिदिन ढेर सारे SMS सन्देश आते है कोशिश कर रहा हू कि आगे से सभी सन्देश अपने ब्लोग पर हिन्दी मे लिखकर आप सभी के साथ बाट लू. मेरा यह प्रयास कैसा लगा? टिपिया कर जरूर बताये.





आप........
रम की तरह मजबूत है.
शराब की तरह अच्छे है 
बियर की तरह ठंडे है
 व्हिस्की की तरह क्लासिक है 
वोदका की तरह परिष्कृत है 
संक्षेप में,
मैं आपकी दोस्ती में पूरी तरह से टुन्न  हूँ
हरि शर्मा, जोधपुर

( चित्र  देवदास फ़िल्म मे  शाहरूख खान का गूगल से साभार )

Sunday, February 28, 2010

होली पर ब्लोगर्स की झान्की


बुरा ना मानो होली है

होली पर नजीर अकबरावदी जी की इस गज़ल से अधिक सार्थक मुझे कुछ भी नही नज़र आता. इसलिये आज की बात यही से शुरु कर रहा हू. बहुत बार ऐसा होता है कि हम होली पर अपने चिर परिचित परिवेश से दूर होते है तब नज़ीर जी के बनाये हुए इन शब्द चित्रो से ही होली की मस्ती और उसके रन्गो को महसूस किया जा सकता है. अगर फ़ागुन नही होता तो होली इतनी मस्ती का त्योहार होता या नही?   चलो फ़ागुन भी होता और डफ की थाप नही होती और ये भी होता तो अगर कोई परी नही होती तो क्या हम ऐसे ही होली पर नशे मे धुत्त होकर रन्ग भरी पिचकारी से किसी की अन्गिया भिगो रहे होते. चून्कि ये सब है और जीवन खुद मे एक रन्गीन उत्सव है कुछ हल्के रन्ग है तो कुछ चटख  रन्ग है ऐसे ही जैसे दुनिया रन्ग बिरन्गी है वैसे ही हमारे ब्लोग जगत के ब्लोगर भी रन्ग बिरन्गे है. आओ आनन्द ले इस रन्गीन दुनिया के रन्गीन ब्लोगर्स के साथ शाब्दिक मस्ती का  -

ब्लोग जगत के सारे ब्लोगर                            गागर मे भर देते सागर


ब्लोगर अनूप शुक्ला                                         थोडी सी मौज क्या ले ली, जमाना रूठ गया
                                                                              हम तो दीवाने थे ही जमाना दीवाना हो गया
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ब्लोगर समीर लाल                                       आसमान से आया फ़रिस्ता ब्लोग का सबक सिखलाने
                                                                       उडनतस्तरी पे बैठ के आता  सबकी  पोस्ट पे टिपियाने
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ब्लोगर ललित शर्मा                                          फ़ौजी जैसा वेश  है लम्बी लम्बी मूछ


                                                                              जिसकी जितनी मूछ है उसकी उतनी पूछ
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ब्लोगर बी एस पाबला                                       तकनीकी उस्ताद है करते पर्दाफ़ास
                                                                              ऐरी गैरी समस्या नही फ़टकती पास                            
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ब्लोगर अनीता कुमार                                       मेरे ब्लोग  को जिन्दगी देने वाली
                                                                              कभी तो मिलोगी नवी मुम्बई वाली
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ब्लोगर सन्गीता पुरी                                         ब्लोग जगत मे सभी का स्वागत करती आप
                                                                               ज्योतिष विद्या मे निपुण  मुझे बता दो जाप                             
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ब्लोगर अविनाश वाचस्पति                             हम ब्लोगर मिलन कर करके सनम
                                                                               लिखते भी रहे पढते भी रहे
                                                                               ब्लोगर सन्गठन की बात क्या कर दी भाई
                                                                               कुछ लोग जुडे कुछ रूठ गये तो रूठ गये
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ब्लोगर अजय झा                                               मै ब्लोगिन्ग का इन्द्रजीत हू नही किसी से डरता हू 
                                                                             कौन है  कितने पानी मे सबकी रिपोर्टिन्ग करता हू                                                 
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ब्लोगर दिनेश राय द्विवेदी                                 सरदार ने जहा ला के  पटका है 
                                                                              अनवरत का वही पर झटका है  
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ब्लोगर महफ़ूज़ अली                                         अरे.........   रूकना ए हसीनो लो मै आ गया 
                                                                              पडे जो जरूरत लाठी बल्लम लेके आ गया                                         
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राजीव - सन्जू तनेजा                                         किसकी फोटो कहा चेप दे कलाकार ये पर भारी है  
                                                                               डरे सिर्फ़ सन्जू भाभी  से  और सभी से यारी है                
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ब्लोगर रश्मि रवीजा                                          मेरी पोस्ट की उमर हो  इतनी   जरूर
                                                                               टीपो या ना टीपो पर इसे पढिये जरूर
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ब्लोगर वन्दना दुबे                                             कहती है कुछ खास नही,   बस किस्सा और कहानी
                                                                               लिखती है जैसे जीवन हो शब्दो से करती मनमानी                                              
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ब्लोगर शिवानी                                      सबसे पहले आप ने करी टिप्पणी खूब 
                                                           बहुत दिनो से ना दिखी अरे मखमली दूब 
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ब्लोगर धीरेन्द्र "काफ़िर"                          गीत  गज़ल  कविता मे तू पारन्गत है ये माना
                                                            बाकी दुनिया ने तुझको मुम्बई वाउन्ड से जाना
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 ब्लोगर सन्जय व्यास                                    मेरा ब्लोग मेरी सोच का सच्चा दर्पण है
                                                                         जो भी सीखा जीवन मे सब यझा अर्पण है          
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ब्लोगर हेम ज्योत्सना                                        व्यस्त हो गये काम मे मिले नही अब वक्त 
                                                                                होली पर जरूरत पडी हेम ज्योति की सख्त 
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ब्लोगर प्रगति                                                      सदा प्रगति के मार्ग मे आते है अबरोध 
                                                                                साधक साधे साधना हटते है गतिरोध
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ब्लोगर डा. एस के मित्तल                                    उद्यम मे अब्बल रहे राष्ट्र धर्म मे लीन
                                                                                गौसेवा करते रहो कभी ना हो गमगीन 
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ब्लोगर अमन                                                        पढने मे होशियार है कविता मे उस्ताद 
                                                                                 पहले कैरियर बना लो सीख रखो ये याद
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ब्लोगर  अनुराधा श्रीवास्तव                               बडी बहिन सी सीख दे  कविता को दे दाद 
                                                                                 लगता है कुछ व्यस्त है आती हमको याद 
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ब्लोगर नाम देव-ज्योत्सना पान्डे                      दिन भर आफ़िस मे फ़से  थके थके है सन्त
                                                                                  ज्योति बिखेरे ज्योत्सना कविता मे गुण्वन्त
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ब्लोगर सूर्य कान्त गुप्ता                                        नित्य रेल से यात्रा घुमदत खूब बिचार 
                                                                                  सन्गत का भी असर है धूम मचा रहा यार 
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ब्लोगर योगेश सम्दर्शी                                          शब्द स्रिजन से ढूढते नित नये समाधान 
                                                                                  राष्ट्र प्रेम से प्रेरणा कलम से सर सन्धान 
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ब्लोगर आवेश तिवारी                                           तेवर तीखे खूब है झुकना ना मन्जूर 
                                                                                  माल उडाते दलाल और कष्ट उठाते शूर
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ब्लोगर राजीव जैन                                                 सिखा रही है जिन्दगी रोज नये ही पाठ
                                                                                   चीरफाड कर लिखे की खोल रहे ये गान्ठ                                                                                                                                                
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ब्लोगर प्रकाश बादल                                              वन बिभाग का काम है पर उलटा - सुल्टा   नाम
                                                                                   बादल होन्गे जिस जगगह क्या प्रकाश का काम                                                                                                             
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 दिगम्बर नासवा                                                     नाम दिगम्बर रखा पर कपडे पहने चार 
                                                                                    इस पर भी कुछ बता दो अपने शुद्ध विचार 
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ब्लोगर अनिल कान्त                                             कह दो जो कहना है अब काहे डरना है
                                                                                   क्यू चिन्ता मुखौटा इक रोज उतरना है                                                                                    
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ब्लोगर श्रद्धा जैन                                                      श्रद्धा तुम सच मे श्रद्धा हो अन्तरजाल के इस नभ मे                                
                                                                                हर वक्त  गज़ल सी लिखी रहो हर ब्लोगर के मन मे                                                
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ब्लोगर शोभना चौधरी                                             पढने ही पढने मे मैने जीवन हाय बिता डाला
                                                                                  दूर अभी है पर कहत है हर पथ बतलाने बाला
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Friday, February 26, 2010

सचिन ने नहीं बेलिन्डा क्लार्क ने लगाया पहला एकदिवसीय दोहरा शतक


इस फोटो को ध्यान से देखिये ये क्रिकेट की मशहूर खिलाडी बेलिंडा क्लार्क है जिन्होने १९९७ के महिला क्रिकेट विश्व कप मे मुम्बई  मे २२९ रन नाबाद बनाये थे और इस तरह एक दिवसीय क्रिकेट का पहला दोहरा शतक लगाने वाली बल्लेबाज बनी. अब जब सचिन तेन्दुलकर ने ये उपलब्धि हासिल कर ली है तो मीडिया यही राग गा रहा है कि वे एक दिवसीय क्रिकेट के पहले दोहरा शतक बनाने वाले बल्लेबाज है. 

यकीनन सचिन ने जो उपलब्धिया हासिल की है उनके लिये सचिन ही नही हम सभी भारतवासी गर्व महसूस करेगे पर जब जिम्मेदार मीडिया तत्थात्मक गलती किये जा रही है तो उस महिला की चर्चा करना समयानुकूल है जिसने ये उपलब्धि पहले बार हासिल की. सही तथ्य यही है कि सचिन एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मैच मे    शतक बनाने वाले पहले पुरुष  बल्लेबाज  है. 

सचिन की उपलब्धियो पर तो जितन भी लिखो कम ही है लेकिन आओ हम थोडी जानकारी बाटे बेलिंडा क्लार्क के बारे मे.  - 
10 सितम्बर 1970 को जन्मी बेलिन्डा क्लार्क  ने १९९१ से २००५ तक आस्ट्रेलिया के लिये क्रिकेट खेली और वो १९९४ से २००५ तक आस्ट्रेलिया महिला क्रिकेत टीम  की कप्तानी थी. उन्होने लम्बे समय तक  आस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट मे मुख्य कार्यकारी अधिकारी की भूमिका भी निभाई जिससे हमे उनके आस्ट्रेलियाई क्रिकेट मे योगदान का पता चलता है. उन्हे १९९८ मे बिजडन  ने बर्ष की सर्वश्रेष्ठ आस्ट्रेलियाई खिलाडी माना. २००५ मे खेल से सन्यास से पहले इन्होने कुल १५ टैस्ट और ११८ एक दिवसीय मैच खेले और १०१ मैचो मे कप्तान रही. उन्होने अपने खेल और कप्तानी से ये सुनिश्चित किया कि आस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट टीम भी पुरुषो की तरह दुनिया मे सबसे मजबूत रहे.


महान आस्ट्रेलियाई विकेट कीपर बल्लेबाज एडम गिल्क्रिस्ट के  साथ 

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Wednesday, February 24, 2010

होली के बहाने यादें बचपन की



आज होली के इस मौके पर जब मैं ब्लॉग लेखक के रूप में धीमी लेकिन सक्रिय शुरुआत कर चुका हूँ, मुझे अपने बचपन की होली याद आती है। याद आती है अपने कस्बे की और वहाँ की होली, जिसकी चर्चा दूर दूर तक थी और आस पास के गाँव के लोग चलकर होली के दिन भी धमाल देखने आते थे।

मैं बात कर रहा हूँ हिंडौन की जहाँ होली १-२ दिन नही बल्कि १ महीने चलने बला त्यौहार हुआ करता था। महिलाए जहाँ १ महीने पहले से ही होली के गीत गाया करती थीं तो पुरूष हुरियारे बने मंदिरों मैं ढोलक और ढप की थाप पर होली गीतों पर गाते और नाचते थे।

होलिका दहन के लिए लड़कों की टोलियाँ घर घर से लकडियाँ और उपले मांग के लाती और उसे अपने गुप्त स्थान पर सुरक्षित रखती साम दाम दंड भेद इस संग्रह को और बढ़ाने के लिए मीटिंग होती योजनाये बनाई जाती। पडौस के होली के सामान की रिपोर्ट ली जाती और अपने लक्ष्य संसोधित किए जाते। होलिका दहन बाले दिन ऐसे कंजूस लोग जो मांगने पर लकडी उपले नही देते उनके घर मौका देखकर सेंध लगाई जाती और जो मिले पलंग, कुर्सी, किवाड़ या कोई लकडी का सामान जो मिला वो होली के हवाले फिर पता चलने पर कंजूस का शोर मचाना और गालिया देना होलिका महोत्सव का चिर परिचित रंग होता था।

मेरे पिताजी की मित्र मंडळी पोंगा मंडल कहलाती थी और इसकी सदस्यता को लोग लालायित रहते थे। इसके सभी सदस्य कस्बे में पढ़े लिखे विचारक माने जाते थे यह पोंगा शब्द मुझे लगता है पोंगा पंडित फ़िल्म से लिया गया था लेकिन ये तय है वे सभी सच्चे पोंगा थे।

पोंगा मंडल प्रति वर्ष होली के मौके पर भभक पत्रिका का प्रकाशन करता था और इसमे मस्त गीत, मस्त विज्ञापन और मस्त टाइटल दिए जाते थे। टाइटल अंतररास्ट्रीय हस्तियों से शुरू होकर स्थानीय लोगो तक होते थे। पोंगा मंडल के सक्रिय सस्दास्यो के नाम अंत में होते थे। भभक में जिनके नाम छपते थे वो ख़ुद को औरो से बड़ा और प्रसिद्द मानते थे और जिनके नही छपते वो अगले साल होली से पहले पोंगाओं से मिलना जुलना बढ़ा देते। कुछ लोग अपने टाइटल को पसंद नहीं करते पर इस डर से की कहने पर अगले साल नाम गायब नही हो जाए चुप रहते। कुछ लोग शिकायत करते, आपने क्या सोचकर हमारे लिए ऐसा टाइटल दिया तो उन्हें तत्काल कोई सकारात्मक तर्क देकर खुश किया जाता।
बाकी तो होली के दिन सवेरे मोहल्लों के मंदिरों के अहातों में लोग इकट्ठे होते और होली के श्लील, अश्लील गाने गाये जाते, खुलेआम नाम ले लेकर गालियाँ दी जातीं। औरतें घर से वहार झांक भी नही सकती थीं। और लड़कों की टोलियाँ अपनी यार दोस्तों के साथ गली गली चक्कर काट रही होती थी लोग अपने मिलने बालो के यहाँ समूग बनाकर खूब घर घर जाकर होली खेलते और भानग ठंडाई और गुजिया - नमकीन खाते रहते। कुछ लोग शराब भी पीते पर उस समय ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी। १ बजे तक ये क्रम चलता। सवेरे लोग घर से निकलते तो कपड़े पहनकर ही वापसी पर जो पहनकर आते उन्हें भी कहते तो कपडा ही हैं लेकिन उनमे वो आधुनिक मल्लिका शेरावत या उस समय की हेलन के रूप लगते थे।
फिर लोग नहा धोकर अच्छे कपड़े पहनकर दोपहर को घर से निकलते गुलाल की होली और धमाल देखने के लिए। शहर के बीचों बीच सभी मोहल्लों की टोलियों के प्रतिनिधि इस धमाल में शामिल होते थे और इस धमाल की चर्चा दूर दूर होती थी। इसमे भी कुछ हद तक गालीबाजी होती थी लेकिन सांस्कृतिक होली के कुछ गीत भी होते थे जिन्हें सुनना रुचिकर लगता था। इस तरह शाम को करीब ७ बजे तक होली की धूम रहती थी।

आप सभी को होली के इस शुभ अबसर पर रंगारंग शुभकामनाये।
पोंगा हरि शर्मा




Wednesday, February 17, 2010

जोधपुर ब्लोगर मिलन - समापन किश्त






ये  ब्लोगरो  के  मेले  
दुनिया  में  कम  ना  होंगे 
अफ़सोस  हम  ना  होंगे 
पिछली  2 पोस्ट  पर  आप  सबके  मिले  प्यार  के  लिए  स्नेहाविभूत  मैं थोडा  डर  सा  गया  हूँ  कि  क्या  मैं   आगे  की  बात  उस स्तर पर  आप  तक  पहुचा   पाउँगा  जैसे  कि और  साथी  आसानी   से  पहुचा  देते  है  और  आप  सभी  मेरे  से  अपेक्षा  कर  रहे  हैं.  
जैसा  कि  मैंने  पहले  बताया  कि   इस  ब्लोगर  मिलन  का  कोई  निश्चित  एजेन्डा नहीं  था  और  प्रमुख  उद्देश्य  था  एक  दूसरे  को  और  ब्लॉग  की  दुनिया  के  विविध  आयामो को जानना  और  खुद  को  इस  विधा  के  लिए  अधिक  सहज  और  प्राभावशाली  बनाना  ही  था. 

तो  अब  आगे  बढ़ते  हैं. सूत्रधार  के  रूप  मे  सबसे  पहले  मैंने  सभी  को  एक  दूसरे  से  परिचित  कराया  और  थोड़ी  ही  देर  मे  हम  सभी  एक  दूसरे  के  साथ  एक  सहज  सम्बन्ध  महसूस  करने  लगे. फिर  मैंने  सभी  को  ब्लॉग  जगत  से  अपने  जुड़ने  की  प्रक्रिया  और  अपने   ब्लॉग  और  अपने  विचार  देने  के  लिए  आमंत्रित  किया. 

बात  शुरू  हुई  श्री  दिनेश  राय  द्विवेदी  जी  से  जो  कि  हमारे  मेहमान  भी  थे  और  हम  सब  मे  वय  और  अनुभव  में  सबसे  बरिष्ठ  भी. उन्होंने  बताया  कि  बेटे  ने   जब  एम सी मे  प्रवेश लिया  तो  उसकी  जरूरत  के  हिसाब  से  कंप्यूटर  लिया  गया  लेकिन  धीरे  धीरे  उसका  सबसे  ज्यादा  उपयोग  मै ही  करता  रहा. ऐसे  ही  जब  नेट  कनेक्शन  लिया  तब  भी  मैंने  ही  इसे  ज्यादा  काम मै लिया. फिर  दोनों  बच्चो  के  पास  अपने  लेपटॉप हो  गए  तो  कंप्यूटर  ऑफिस  मै  आ  गया. बहुत  दिन  तक  मै  औरो  के  ब्लॉग  पढता  रहा. मेरा  ब्लॉग  से  जुड़ने  का  मन  था  लेकिन  मै  कोई  भी  काम  करता  हूँ  तो  खूब  सोचकर  और  फिर  पूरी   तयारी  के  साथ  करता  हूँ . मैंने  तीसरा  खम्बा  के  माध्यम  से  न्याय  व्यबस्था  की  कमियों  से  होने  बाली  परेशानियों  पर  लिखा. भारत  मै  न्याय  व्यबस्था  के इतिहास  पर  भी  मैंने  नियमित पोस्ट  लिखी. इसके  साथ  ही  मैं  ब्लॉग  के  जरिये  देश  के  हर  कोने  से  आने  बाली  सलाह  की  प्रार्थना  को  भी  पोस्ट   के  रूप  में  अपने  ब्लॉग  पर  जगह  देता  रहा  हू. इसके  अलावा  मेरा  अनवरत  ब्लॉग  भी  समसामयिक  मुद्दों  और  सरोकारों, कविता  और  अन्य   साहित्यिक  रुचियों  के  लिए  लगातार  पढ़ा  जाता  है. वकील  साहब  ने  बताया  कि  सबसे  पहले  उन्होंने  एक  अखवार  मे  काम  किया  और  फिर उन्हें  मुंबई  के  एक  अखवार  मे  काम  करने  का  निमंत्रण  था  लेकिन  मुंबई  उन्हें रास  नहीं  आई  सो  वापिस  लौट  आये. 

१९७८  मै  वकालत  शुरू  की  उसमे  भी  शुरू  से  शोषित  और  मजदूर  के  हक़  के  लिए  लड़ना  ही  मुख्या  ध्येय  रहा. वकील  साहब  ने  ये  भी  कहा  की  उनका  माना  है  की  अभी  ब्लोग जगत  शैशव  अवस्था  मै  है  लेकिन  आगे  जो  अच्छा  लिखेगा  उसे  ही  यद्  किया  जाएगा  और  उन्हें  भी  लोग  पढ़ते  है  तो  अच्छा  लगता  है  और  जहा  लिखा  हुआ  उनको  अच्छा  लगता  है  वहा  वो  प्रोत्साहन  भी  देते  है  और टिप्पणी  मै  अपनी  राय  भी  देते  हैं. कुछ  ख़ास  ब्लोगर्स  की  चर्चा  चलने  पर  वकील  साहब  ने  कहा  की  वो  यथा  संभव  सभी  के  ब्लॉग  पढ़ते  हैं  कुछ  से  नेट  पर  और  फ़ोन  पर  चर्चा  भी  होती  है  एक  चर्चित  ब्लोग्गर ( जो  ब्लॉग  पर  नारीवाद  की  अति  और  पुरुष  विरोधी  मानसिकता  के  लिए  जानी  जाती  है ) का  जिक्र  आया  तो  आपने  कहा  की  उनसे  नारी  मुद्दों  पर  खूब  चर्चा  होती  थी  और  वो  उनके  विचार  भी  मांगती  थी  लेकिन  एक  दिन  उस  ब्लोग्गर  की   किसी  पोस्ट  से  उन्होंने  पूरी  असहमति  दर्ज  की  तो  उन्होंने  कहा  अब  मै  कभी  आपसे  बात  नहीं  करूंगी  तो  उन्होंने  भी  खुशी  से  हमेशा  के  लिए  विदा  दे  दी. अजीत  वडनेकर  के  ब्लॉग  पर  उनके  संस्मरण  भी  छपे  है  जिन्हें  सभी  ने  बहुत  पसंद  किया  था .

इसके  बाद   चर्चा  को  संजय व्यास  ने  आगे  बढ़ाया  और  उन्होंने  अपने  बारे  मे   बताया  की  वो  बाड़मेर  से  है  तो  बात   चली  बाड़मेर  और  जोधपुर  के  जीवन  की  और  वहा  युवाओ  के  लिए  अब्सरो  के  अभाव  की. वहा  के   ग्रामीण  परिवेश  की  जोधपुर  के  जीवन  से  तुलना  और  अब  जब  वहा  तेल  के  भण्डार  मिले  है  और  रिफाइनरी  खुलने  ही  बाली  है  तब  बदले  माहौल  मे  रोज़गार  और  जीवन  मे  संभावित  बदलाव  पर  खुलकर  चर्चा  हुई. संजय  ने  ये  भी  बताया  की  वो  अपने  ब्लॉग  पर  केवल  गंभीर  लेखन  करते  है  और  टिप्पणी  लेने  देने  से  बहुत  प्रभावित  नहीं  होते.

चर्चा  की  कड़ी  से  जुड़ते  हुए  सीप  का  सपना  ब्लॉग  के  श्री  राकेश  मूथा जी  ने  अपने  लेखन  के  सरोकारों, कविता   और  नाटको  से  अपने  लगाव  और  सक्रियता  का  जिक्र  किया. सीप  का  सपना  नाम  से  उनकी  कविताओ की  पुस्तक  भी  प्रकाशित  हुई  थी  और  अब  सीप  का  सपना  ब्लॉग  में  लगभग  नियमित  रूप  से  वे  अपनी  नयी  कविताएं  डालते  रहते  हैं. उनके  कुछ  नियमित  पाठक  हैं उनकी  टिप्पणिया  भी  मिलती  हैं. 

इसके  बाद  चर्चा  का  सूत्र  एक  मात्र  महिला  ब्लोगर  कुमारी  शोभना  चौधरी  को  मिला. उनको  लेकर  कौतूहल  सभी  को  २  कारणों  से  था एक  तो  इन  दिनों  वो  रिसर्च मे  पूरी  तरह  डूबी  हुई   हैं और  इस   रिसर्च के  काम  की  एकरूपता को   तोड़ने  और  उस  मूड से  बाहर  आने  के  लिए  वे  सर्फिंग करती  हैं  और  इसी  लिए  अपने  ब्लॉग  पर  जो  मन  को  भाता   है  वो  लिखती  हैं. अपने  परिचय  मे  वेहद  प्रतिभाशाली  और  बहुमुखी  प्रतिभा  की  धनी  शोभना  ने  १०वी  कक्षा  मे  राजस्थान  बोर्ड  की  अपनी  मेरिट और  आगे  की  शैक्षणिक  उपलब्धियों  के  अलावा  शिक्षेतर गतिबिधियों से  जुड़े  होने  और  गणतंत्र  दिवस  परदे  मे  हिस्सा  लेने  और  अन्य  उपलब्धियों  का  जिक्र  किया. शोभना से सभी  ये  भी  जानना  चाहते  थे  कि  ऐसी  क्या  बात  हुई  कि   उन्होंने  ब्लॉग  जगत  को  छोड़ने  का  निर्णय  लिया  वो भी  तव  जबकि  उन्होंने  उसी  दिन  इस  ब्लोगर  मिलन  में   भाग  लेने  की  पुष्टि  कर  दी  थी.

इस  मामले  में  शोभना  जी  का  कहना  था  कि  वो  ब्लॉग  जगत  में  इस  आशा  के  साथ  आयी  थी  कि  यहाँ  आम  जीवन  से  अलग  थोड़े  लेकिन  पढ़े  लिखे  और  परिष्कृत  रूचि  के  लोग  होंगे  और  पढने  लिखने  बाले  लोगो  के  बीच  जाकर  उन्हें  सुकून  मिलेगा.   लेकिन  पिछले  बहुत  दिन  से  वो  जिस  तरह  के  आरोप  प्रत्यारोप  ब्लॉग  जगत  में  देख  पढ़  रही  है  उससे  उनका  मन  खराब हो  गया . उनको  सबसे  ज्यादा  दुःख  इस  बात  का  होता   है  कि  बहुत  से  लोग  साधारण  पोस्ट  को  असाधारण  बताकर  कमेन्ट  करते  है. वे  खुद  बहुत  कम  कमेन्ट  करती  है  क्युकी  इतना  समय  उनके  पास  नहीं  होता  तो  ऐसे  मे  कुछ  लोगो  ने  उनको  अशोभनीय  कमेन्ट  भेजे  जिनका  निहितार्थ  ये  था  कि  वो  लडकी  है  इसलिए  इतने  कमेन्ट  आते  हैं. इस  बात  पर  सभी  ने  चर्चा  की. मेरा  खुद का  मानना  है  कि  ब्लॉग  जगत  भी  बाकी  दुनिया  का  ही  प्रतिबिम्ब  ही  है  और  महिला  होने  के  कुछ  फायदे  होते  है  तो  कुछ  नुक्सान  भी  लेकिन  इसके  लिए  ब्लोगर  महिला  को  तब  तक  दोषी   नहीं  ठहरा  सकते  जब  तक  वो  अपनी  तरफ  से  ऐसे  कमेन्ट  करने  बालो  को  ना उकसाती  हो. सभी  साथी  ब्लोगर्स    ने  शोभना  जी  से  अनुरोध  किया  कि  वो  अपना  लेखन  ऐसे  ही  जारी  रखे  और  इस तरह  के  लोगो  से  घबराये  नहीं.

मेरे  अलावा  जो  बचे  हुए  वक्ता  रहे  वो  थे  कुश जो कि शायद  सबसे  उर्जावान  युवा  ब्लोगर  हैं  और  पूरे  ब्लॉग  जगत  मैं  उनकी  बहुआयामी  प्रतिभा  का  लोहा  माना  जता  है . वो  जयपुर  में  एक  सॉफ्टवेर  डेवेलोपमेंट  कंपनी  मैं  कार्यरत  हैं  और  ब्लॉग  जगत  में  तकनीक, लेखन  प्रतिभा  और  सक्रियता  के  लिए  जाने  जाते  हैं  वो  यदा-कदा  चिटठा  चर्चा  भी  करते  है  और  उनकी  चिटठा  चर्चा  को  बहुत  पसंद  किया  जता  है. उन्होंने  ब्लॉग  जगत  के  अपने  अनुभव  भी  बताये  और  सक्रिय  ब्लोग्गरों  के  ब्लॉग  और  उनके  लेखन  पर  भी  चर्चा  की.  साथ  ही  ब्लॉग  जगत  में  होने  बाले  विवादों जैसे  बबली  जी  के  ब्लॉग  पर  हुई  गरमागरम   चर्चा  पर  भी  उन्होंने  अपनी  राय  जाहिर  की. मेरे  द्वारा  एक  ख़ास  ब्लोग्गर  को  घोर  पुरुष विरोधी  और  उनके  रवैये  को  अड़ियल  बताया  गया  तो  उनका  कहना  था  कि  उस ब्लोगर  का जो  स्टैंड  है  वो  उस  पर  पूरी  ताकत  से  काम  कर  रही  हैं.. 

इस  सारी  आपसी  चर्चा  में  जिन  ब्लोग्गर बंधुओं को  याद  किया  उनमे अविनाश  जी , अनूप  शुक्ल  जी ,  समीर  लाल  जी,   अरविन्द  मिश्रा  जी, ललित  शर्मा  जी, पावला  जी, अनीता  कुमार  जी (अनीता  जी  के  ब्लॉग  को  पढके  ही मुझे  ब्लॉग  जगत  के  बारे  मे  पता  लगा), रश्मि  रविजा  जी, अदा  जी, शिखा  वर्श्नेय  जी, भाई  मिथिलेश, भाई  महफूज, भाई  अजय  झा  जी  के  ब्लॉग  और  उनके  योगदान  पर  तो  चर्चा  हुई  ही  साथ  ही  नाइस   टिप्पणी  से  सबको  उपकृत  करने  बाले  ब्लोगर सुरेश जी  की   भी  चर्चा  हुई.

डिस्क्लेमर  

1. ये  चर्चा  तब  तक  अधूरी  ही  कही  जायेगी  जब  तक  कि  अगली  बार   मिलने  की  तमन्ना  बाकी  रहेगी. 
2. पुनः  इस  मिलन  और  चर्चा  का  उद्देश्य  ये  है  कि  अधिक  से  अधिक ब्लोग्गर  हमसे  जुड़  सकें.. .
3. राजस्थान  के  अन्य  शहरो  के  ब्लोग्गर  भी  कृपया  ब्लॉग  जगत  में  अपनी  उपस्तिथी  की  सूचना  से  अवगत  कराये.
4. मुझे  उम्मीद  थी  कि  वकील  साहब, कुश, संजय, राकेश जी और शोभना  की  तरफ  से  ये  विवरण  मेरे  से  पहले  आ   जाएगा  इसी  लिए  इस  विवरण  के  लिए  तीसरी  कड़ी   तक  इंतज़ार  कराया. इस  देरी  के  लिए  सिर्फ  मै  दोषी  हूँ.  
5. मुझे  सजा  सुनाने  के  लिए  इस  पोस्ट  पर  टिप्पणी  करना  अनिवार्य  नहीं  है  पर  करे  तो  डिलीट  नहीं  की  जायेगी.
वकील साहब फिर आना